जोधपुर, 15 मई।
राजस्थान उच्च न्यायालय की न्यायाधीश डा. नूपुर भाटी ने बैंक अधिकारी की रिट याचिका को खारिज करते हुए परीवीक्षा अवधि में अनाधिकृत अवकाश के आधार पर बिना विभागीय कार्रवाई के की गई सेवा समाप्ति को उचित, वैध और विधिसम्मत ठहराया है।
याची ऋषि कुमार ने याचिका में तर्क दिया था कि उनकी नियुक्ति राजस्थान मरुधरा ग्रामीण बैंक (वर्तमान राजस्थान ग्रामीण बैंक) में श्रेणी तीन अधिकारी के रूप में हुई थी और वर्ष 2023 में उन्होंने त्यागपत्र का आवेदन प्रस्तुत किया था, लेकिन कुछ दिनों के अवकाश पर रहने के कारण 6 फरवरी 2025 को बैंक अध्यक्ष द्वारा बिना विभागीय कार्रवाई किए उनकी सेवा समाप्त कर दी गई, जिसे उन्होंने अवैध बताते हुए निरस्त करने की मांग की थी।
बैंक की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने कहा कि सेवा समाप्ति के साथ एक माह का वेतन याची के खाते में भेजा गया था, जिसे उन्होंने निकाल लिया, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि उन्होंने सभी आपत्तियों का परित्याग कर दिया है। साथ ही यह भी कहा गया कि सशर्त इस्तीफे और आवश्यक औपचारिकताएं पूर्ण न होने के कारण उसे स्वीकार नहीं किया गया तथा परीवीक्षा अवधि में 513 दिन अनाधिकृत अवकाश पर रहने के कारण यह कार्रवाई दंडात्मक नहीं बल्कि सरल सेवा समाप्ति है।
न्यायालय ने अपने निर्णय में उल्लेख किया कि याची को वर्ष 2022 और 2024 में डमी अभ्यर्थी के रूप में परीक्षा देते हुए पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था और वह लगभग सवा दो माह तक जेल में भी रहा। अदालत ने कहा कि 17 जून 2022 से फरवरी 2025 तक कुल 513 दिन अवकाश पर रहने के कारण नियोक्ता उसके कार्य मूल्यांकन से वंचित रहा।
न्यायालय ने यह भी कहा कि बैंक जैसे संस्थान में श्रेणी तीन अधिकारी की भूमिका अत्यंत जिम्मेदारीपूर्ण होती है, जहां जनता का धन जमा रहता है और उनसे अनुशासन, ईमानदारी तथा जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि परीवीक्षा अवधि में कर्मचारी के आचरण, कार्यक्षमता और निष्ठा का मूल्यांकन आवश्यक होता है, जो लंबे अवकाश के कारण संभव नहीं हो सका। केवल इस्तीफे का आवेदन देने मात्र से कर्मचारी को अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने का अधिकार नहीं मिलता और उसे सेवा जारी रखनी होती है।
न्यायालय ने कहा कि बैंक की ओर से कई बार ड्यूटी पर लौटने के लिए नोटिस दिए गए थे और विभागीय कार्रवाई की चेतावनी अथवा स्पष्टीकरण की प्रक्रिया के बिना भी इस प्रकार की सरल सेवा समाप्ति को दंडात्मक आदेश नहीं माना जा सकता, इसलिए यह आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है और पूर्णतः विधिसम्मत है।



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