एक माननीय साहब कभी मंत्री रहते हुए राजधानी में ऐसा दरबार लगाते थे कि सुबह से शाम तक फरियादियों और समर्थकों की लाइन लगी रहती थी, लेकिन अब भोपाल फीका-फीका लगने लगा...
एक माननीय साहब कभी मंत्री रहते हुए राजधानी में ऐसा दरबार लगाते थे कि सुबह से शाम तक फरियादियों और समर्थकों की लाइन लगी रहती थी। लेकिन इस बार मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, तो भोपाल भी उन्हें कुछ फीका-फीका लगने लगा है। बंगला अब भी है, पर वह गाड़ियों का काफिला, नौकर-चाकरों की भागदौड़ और दरबार की रौनक अब दिखाई नहीं देती। इसलिए जो भी पूछ ले कि भोपाल में कब मिलेंगे, तो माननीय मुस्कराकर कह देते हैं—अब भोपाल में दिल नहीं लगता।