मध्य प्रदेश
23 May, 2026

चंबल में घड़ियाल संरक्षण को बड़ी सफलता, 70 शावकों का हुआ जन्म

मुरैना के चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य के देवरी केंद्र में अंडों से लगभग 70 शावकों के जन्म ने घड़ियाल संरक्षण प्रयासों को बड़ी सफलता दिलाई है।

मुरैना, 23 मई ।

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य के देवरी केंद्र पर शनिवार को विशेष उत्साह का माहौल देखने को मिला, जहां विलुप्तप्राय जलीय जीव घड़ियाल के अंडों से एक ही दिन में लगभग 70 शावक बाहर निकले।

जानकारी के अनुसार आगामी दिनों में लगभग 130 अंडों से और शावकों के बाहर आने की संभावना जताई गई है, जिससे वन्यजीव संरक्षण प्रयासों को बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

वर्तमान में चंबल नदी के 435 किलोमीटर क्षेत्र में घड़ियालों की संख्या बढ़कर 2938 तक पहुंच गई है और इस वर्ष जन्मे शावकों को तीन वर्ष तक देवरी केंद्र में विशेष देखरेख में रखा जाएगा, जिसके बाद उन्हें विभिन्न नदी घाटों पर प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाएगा।

इससे पूर्व भी देवरी घड़ियाल केंद्र से देश की कई नदियों जैसे सोन, केन, कूनो सहित पंजाब की नदियों में घड़ियालों को संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से भेजा जा चुका है।

घड़ियाल की प्राकृतिक वातावरण में जीवित रहने की दर लगभग दो प्रतिशत मानी जाती है, जबकि कृत्रिम संरक्षण में यह दर लगभग पचास प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जिससे संरक्षण केंद्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

जानकारी के अनुसार मादा घड़ियाल मार्च के अंत से अप्रैल की शुरुआत में नदी किनारे रेत में गड्ढा बनाकर लगभग 20 से 55 अंडे देती है, जिनकी निगरानी वन विभाग द्वारा की जाती है और मई के अंत तक शावक बाहर निकल आते हैं।

वर्ष 1975 से 1977 के बीच हुए वैश्विक सर्वे में विश्व में पाए गए लगभग 200 घड़ियालों में से 96 भारत में और उनमें से 45 चंबल नदी में पाए गए थे, जिसके बाद वर्ष 1979 में चंबल नदी के 435 किलोमीटर क्षेत्र को राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य घोषित किया गया।

इसके बाद नदी में रेत खनन, परिवहन और जलीय जीवों के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया तथा संरक्षण कार्यों के लिए देवरी केंद्र की स्थापना की गई, जहां प्रतिवर्ष लगभग 200 अंडों का संरक्षण किया जाता है।

देवरी केंद्र में शावकों को संक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए विशेष देखभाल, औषधीय घोल और नियंत्रित वातावरण में रखा जाता है तथा लगभग तीन वर्ष की अवधि पूरी होने पर उन्हें पुनः नदी में छोड़ा जाता है।

वन विभाग के अनुसार इस वर्ष श्योपुर के बरोली घाट और मुरैना के बाबूसिंह घेर घाट से लाए गए अंडों में से शावकों का निकलना शुरू हो गया है, जो घड़ियाल संरक्षण परियोजना की सफलता को दर्शाता है।

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