केरल में मुख्यमंत्री चयन को लेकर सहयोगियों और आंतरिक दबावों के बीच कांग्रेस नेतृत्व को लंबे मंथन के बाद निर्णय लेना पड़ा, जिससे पार्टी हाईकमान की कार्यशैली और आंतरिक संतुलन पर सवाल उठे।
19 मई।
सभी चुनावी राज्यों में मुख्यमंत्री की शपथ के बाद सबसे अंत में कांग्रेस केरल में अपना मुख्यमंत्री घोषित कर पाई। भले ही मुस्लिम लीग और दूसरे सहयोगियों के दबाव में कांग्रेस का फैसला सही माना जा रहा हो, लेकिन धारणा यही बनी कि राहुल गांधी अपने चहेते के.सी. वेणुगोपाल को चाहते हुए भी मुख्यमंत्री नहीं बना पाए।
राहुल गांधी को सहयोगियों और राज्य के नेताओं के दबाव में वी.डी. सतीशन को विधायक दल का नेता चुनना पड़ा। अब तक कांग्रेस में ऐसा संभव नहीं हो पाता था। जिस नेता को गांधी परिवार का समर्थन होता था, उसी को मौका मिलता था। अगर कांग्रेस को सतीशन के पक्ष में ही फैसला करना था, तो यह निर्णय तिरुवनंतपुरम में ही लिया जा सकता था। वेणुगोपाल कांग्रेस के संगठन महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर हैं। उन्हें राहुल गांधी और पार्टी के बीच संवाद की प्रमुख कड़ी माना जाता है।
कांग्रेस के पर्यवेक्षकों ने हाईकमान को जो प्रतिवेदन दिया, उसमें बताया गया कि विधायकों में बहुमत का समर्थन वेणुगोपाल के साथ है। टिकट वितरण में उनकी भूमिका होने के कारण अधिकांश विधायक उनके पक्ष में थे। कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। सहयोगियों के साथ गठबंधन को बहुमत प्राप्त हुआ है।
गठबंधन का सबसे बड़ा सहयोगी मुस्लिम लीग है और उसका समर्थन सतीशन के साथ था। नेता चुनने में विलंब होने पर पूरे राज्य में राहुल और प्रियंका गांधी के विरोध में प्रदर्शन शुरू हो गए। प्रियंका गांधी के संसदीय क्षेत्र वायनाड में मुस्लिम लीग का सहयोग चुनावी दृष्टि से अनिवार्य माना जाता है। वहां पोस्टर लगाकर विरोध जताया गया। यह संदेश दिया गया कि यदि जनभावनाओं के अनुरूप नेता का चयन नहीं हुआ, तो वायनाड को अमेठी बना दिया जाएगा। यानी गांधी परिवार के लिए वहां चुनाव जीतना कठिन हो सकता है।
धारणा यही बनी रही कि राहुल गांधी वेणुगोपाल को ही मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। यह भी सामने आया कि इस विषय पर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी के बीच वैचारिक मतभेद थे। अंततः कांग्रेस ने जो फैसला लिया, वह पार्टी और राज्य के हित में उचित दिखाई पड़ता है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के दूरगामी प्रभाव भविष्य की रणनीति पर अवश्य पड़ेंगे।
यह पहली बार हुआ है कि राज्य के दबाव में गांधी परिवार को मनमाफिक फैसले से पीछे हटना पड़ा। अब तक जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनीं, वहां वही नेता मुख्यमंत्री बना, जिसे गांधी परिवार चाहता था। जनभावनाओं और नेतृत्व की पसंद के बीच बना यह टकराव कई राज्यों में असंतोष का कारण बन चुका है।
सरकार बनाने से ज्यादा परेशानी कांग्रेस को विधायक दल का नेता चुनने में होती रही है। कर्नाटक में इसी तनाव से बचने के लिए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच ढाई-ढाई साल का सूत्र निकाला गया, लेकिन अब तक उसे लागू नहीं किया जा सका। इसका असर राज्य में सरकार और संगठन, दोनों के कामकाज पर दिखाई पड़ रहा है।
पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी मुख्यमंत्री चयन को लेकर पैदा हुए असंतोष का नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ा। पांच वर्षों तक नेताओं के बीच खींचतान चलती रही। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खुलेआम टकराव सामने आया। मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया गुटों के बीच पनपा असंतोष आखिरकार सरकार गिरने का कारण बना। हिमाचल प्रदेश में भी नए मुख्यमंत्री के चयन के बाद विधायकों ने विद्रोह किया। भले ही वहां सरकार बच गई, लेकिन भीतर का असंतोष अब भी बना हुआ है।
अगर राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व सतीशन के नेतृत्व में एलडीएफ सरकार के खिलाफ पिछले पांच वर्षों में चले अभियानों के जमीनी असर से सीधे जुड़ा होता, तो मुख्यमंत्री चुनने में इतना समय नहीं लगता। वेणुगोपाल और रमेश चेन्नीथला जैसे नेता, जो जनमत के केंद्र में नहीं थे, विधायकों के समर्थन के सहारे मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना चाहते थे। गांधी परिवार से वेणुगोपाल की निकटता के कारण यह फैसला लंबा खिंच गया और इसी दौरान संगठन के भीतर असंतोष के बीज भी पड़ गए।
केरल राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक राज्य है। वहां हिंदू, मुस्लिम और ईसाई ध्रुवीकरण लंबे समय से राजनीति को प्रभावित करता रहा है। शिक्षा और डिजिटल साक्षरता के साथ डिजिटल वैमनस्य भी वहां स्पष्ट दिखाई देता है। अब भाजपा भी वहां प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने लगी है। भाजपा के तीन विधायकों की जीत भविष्य की राजनीति के संकेत मानी जा रही है।
केरल में विधायक दल के नेता के चयन ने कांग्रेस हाईकमान की कमजोरी भी उजागर की है। पहली बार ऐसा हुआ कि जनभावनाओं के दबाव में गांधी परिवार को अपना फैसला बदलना पड़ा। सतीशन के नाम पर अंतिम निर्णय लेने में दिखाई गई हिचकिचाहट और देरी ने केरल में कांग्रेस की चमकदार छवि को भी प्रभावित किया है।