संपादकीय
21 May, 2026

बच्चों को सफल के साथ सुरक्षित भी बनाइए: भावनात्मक परिपक्वता ही अच्छी पैरेंटिंग की असली कसौटी

आज के समय में बच्चों की परवरिश में केवल सफलता ही नहीं बल्कि उनकी भावनात्मक सुरक्षा और आत्मविश्वास को भी प्राथमिकता देना आवश्यक बताया गया है, जहां अच्छी पैरेंटिंग की असली पहचान भावनात्मक परिपक्वता मानी गई है।

भोपाल, 21 मई।

आज का समय भारतीय परिवारों के लिए एक ऐसे दौर के रूप में सामने आ रहा है, जहां बच्चों के जीवन में पढ़ाई, करियर, अंक और प्रतियोगी परीक्षाओं की चिंता सबसे ऊपर दिखाई देती है, लेकिन इसी भागदौड़ में यह सवाल पीछे छूट जाता है कि बच्चा घर में खुद को कितना सुरक्षित और सहज महसूस कर रहा है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार वर्तमान पैरेंटिंग की सबसे बड़ी चुनौती यह बन गई है कि माता-पिता बच्चों को केवल सफल बनाने पर केंद्रित हो गए हैं, जबकि उन्हें आत्मविश्वासी और खुश व्यक्ति बनाने की आवश्यकता कहीं न कहीं कमजोर पड़ती जा रही है।

घरों में आज महंगे खिलौने, कोचिंग सामग्री और डिजिटल साधनों की भरमार तो दिखती है, लेकिन संवाद, धैर्य और अपनापन कई जगहों पर कम होता जा रहा है, जिससे बच्चे भावनात्मक रूप से दूरी महसूस करने लगते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे की सबसे पहली सीख उसका घर होता है, जहां वह अपने माता-पिता के व्यवहार से जीवन को समझता है, और यदि वहां लगातार डांट, तुलना और अपमान का वातावरण हो तो बच्चा स्वयं को कमजोर मानने लगता है।

बच्चों की बातों को अक्सर बड़े यह समझकर टाल देते हैं कि वह अभी छोटे हैं और नहीं समझ पाएंगे, लेकिन वास्तविकता यह है कि बच्चे भी उपेक्षा और अपमान को उतनी ही गहराई से महसूस करते हैं, हालांकि वे उसे व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते।

बचपन में यदि बच्चा बार-बार अनसुना किया जाता है तो वह धीरे-धीरे चुप रहने की आदत विकसित कर लेता है, जिसे कई बार अनुशासन समझ लिया जाता है, जबकि यह भावनात्मक दूरी का संकेत होता है।

बच्चों की आवश्यकताएं उम्र के साथ बदलती रहती हैं, जहां छोटे बच्चों को सुरक्षा, बड़े बच्चों को संवाद और समझ तथा किशोरों को भरोसा और सम्मान की आवश्यकता होती है, लेकिन अक्सर हर उम्र में केवल आज्ञाकारिता की अपेक्षा की जाती है।

तुलना आधारित वाक्य जैसे पड़ोस के बच्चे से तुलना या पुराने समय के उदाहरण बच्चों के मन में हीन भावना पैदा करते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है और वे लगातार स्वयं को साबित करने के दबाव में रहते हैं।

आज के समय में सोशल मीडिया ने भी इस दबाव को और बढ़ा दिया है, जहां उपलब्धियों को प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है और कई बार माता-पिता अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोपने लगते हैं।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि माता-पिता द्वारा अपनी गलतियों को स्वीकार करना बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख होती है, जिससे वे समझते हैं कि गलती जीवन का हिस्सा है और उसे सुधारना जरूरी है।

गुस्से में कही गई बातों के बाद यदि माता-पिता अपनी गलती स्वीकार कर लेते हैं तो यह बच्चे के मन से डर और अपराधबोध को कम करता है और उनके बीच विश्वास को मजबूत बनाता है।

डर पर आधारित अनुशासन अस्थायी होता है, जिससे बच्चा या तो भीतर से डरपोक बनता है या फिर विरोधी स्वभाव अपना लेता है, इसलिए सही अनुशासन का अर्थ सीमाएं तय करना और समझ विकसित करना है।

बच्चे के व्यवहार को समझना और उसकी बात सुनना अधिक प्रभावी होता है, जबकि सीधे दोषारोपण करने से उसका आत्मसम्मान प्रभावित होता है और उसका मानसिक विकास बाधित होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार शब्दों का चयन बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है, जहां व्यवहार की आलोचना आवश्यक है लेकिन व्यक्तित्व पर हमला उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है।

अंततः बच्चों को केवल सफलता या उपलब्धियों की नहीं, बल्कि ऐसे सुरक्षित और समझदार वातावरण की आवश्यकता होती है जहां वे बिना भय के अपनी बात रख सकें, गलती कर सकें और स्वीकार किए जा सकें।

|
आज का राशिफल

इस सप्ताह आपके लिए अनुकूल समय है। पेशेवर मोर्चे पर सफलता मिलने के योग हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी सुकून और संतोष रहेगा।
भाग्यशाली रंग: लाल
भाग्यशाली अंक: 9
मंत्र: "ॐ हं राम रामाय नमः"

आज का मौसम

भोपाल

30° / 41°

SUNNY

ट्रेंडिंग न्यूज़