संपादकीय
21 May, 2026

स्कूलों में टॉयलेट का सपना कब होगा पूरा: मप्र के 788 स्कूलों में टॉयलेट नहीं, खुले में शौच जाने को मजबूर बेटियां

मध्य प्रदेश के 788 स्कूलों में शौचालय सुविधा की कमी और निर्माण में हुए भ्रष्टाचार के खुलासे ने शिक्षा व्यवस्था और छात्राओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भोपाल, 21 मई।

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय सुविधा की कमी ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां 788 स्कूलों में आज भी टॉयलेट नहीं होने से बेटियां खुले में शौच को मजबूर हैं और धार जिले में शौचालय निर्माण के नाम पर करोड़ों की राशि में घोटाले और रिश्वतखोरी का मामला उजागर हुआ है, जिससे पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

प्रदेश के 788 शासकीय विद्यालयों में बालिकाओं के लिए शौचालय सुविधा नहीं होने का मामला सामने आया है, जबकि इन्हें उपलब्ध कराने के लिए 2 करोड़ 30 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था, लेकिन कई जगह यह राशि मूल कार्य के बजाय फर्नीचर और भवनों की रंगाई-पुताई में खर्च कर दी गई, जिसके कारण छात्राओं को मजबूरी में खुले स्थानों या दीवारों की आड़ में शौच जाना पड़ रहा है।

धार जिले में शौचालय निर्माण से जुड़ा बड़ा भ्रष्टाचार भी सामने आया है, जहां 122 शौचालयों के निर्माण से पहले ही पूरा होने का प्रमाण पत्र जारी करने के बदले 17 लाख रुपये की मांग की गई, वहीं 3.42 करोड़ रुपये की परियोजना में अनियमितताओं का खुलासा हुआ और लोकायुक्त कार्रवाई में एक अधिकारी को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया।

अशोकनगर जिले के एक प्राथमिक विद्यालय में पिछले पांच वर्षों से शौचालय नहीं है, जहां 26 छात्राएं मजबूरी में खुले में जाती हैं, जबकि राजगढ़ के ब्यावरा क्षेत्र में 135 बच्चों को ऐसे परिसर में पढ़ाई कराई जा रही है जहां टॉयलेट की सुविधा नहीं है और महिला शिक्षिकाओं को बाहर पहरा देना पड़ता है।

इसी तरह अशोकनगर के पछारी गांव के स्कूल में 23 छात्राएं शौचालय के अभाव में परेशान हैं और कई बार आधे दिन बाद घर लौट जाती हैं, जिससे यह स्थिति प्रदेश के 788 स्कूलों की वास्तविक तस्वीर को दर्शाती है, जहां अनुमानित 40 हजार से अधिक छात्राएं प्रतिदिन इस समस्या का सामना कर रही हैं।

धार में उजागर घोटाले के बाद यह भी सामने आया है कि शौचालय निर्माण में बिना काम के प्रमाण पत्र जारी करने के लिए कमीशन तय किया जाता है और कई जगह निर्माण पूरा किए बिना ही पूरी राशि निकाल ली गई, जबकि फर्जी जियो-टैगिंग और फोटो अपलोड कर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।

इस स्थिति का सीधा असर छात्राओं की शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, जहां मासिक धर्म के दौरान कई छात्राएं स्कूल नहीं जातीं और संक्रमण, डिहाइड्रेशन तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ रहा है, वहीं असुरक्षित वातावरण में उन्हें मानसिक दबाव भी झेलना पड़ रहा है।

व्यवस्था की खामियों के तहत जिला, स्कूल और निगरानी स्तर पर गंभीर लापरवाही सामने आई है, जहां बजट का उपयोग गलत मदों में किया गया और निगरानी तंत्र कागजी साबित हुआ, जिससे वास्तविक स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड में भारी अंतर देखने को मिल रहा है।

अब आवश्यकता इस बात की बताई जा रही है कि सभी स्कूलों का स्वतंत्र भौतिक सत्यापन किया जाए, निर्माण कार्य की निगरानी पारदर्शी तरीके से हो, जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए और शौचालय निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह जवाबदेह बनाया जाए ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।

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