नई दिल्ली, 21 मई।
देश में आवारा कुत्तों के हमलों और उनसे जुड़ी लगातार हो रही मौतों के बीच सुप्रीम कोर्ट का नवीनतम निर्णय एक निर्णायक और लंबे समय से प्रतीक्षित हस्तक्षेप के रूप में सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नागरिकों की जान और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि कोई आवारा कुत्ता रेबीज से ग्रस्त, असाध्य रूप से बीमार या अत्यधिक आक्रामक पाया जाता है, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत उसका इच्छामृत्यु संभव है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि सद्भावना में कार्य करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध सामान्य स्थिति में आपराधिक कार्रवाई नहीं होगी।
यह निर्णय केवल न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि उस गंभीर सामाजिक स्थिति का संकेत है, जिसे देशभर के नागरिक लंबे समय से अनुभव कर रहे हैं। शहरी क्षेत्रों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक आवारा कुत्तों के हमले अब आम घटनाओं में शामिल हो चुके हैं। छोटे बच्चे, बुजुर्ग, विद्यार्थी, सुबह टहलने वाले लोग और यहां तक कि विदेशी नागरिक भी इन घटनाओं से प्रभावित हुए हैं, जिनमें कई मामलों में जानलेवा स्थिति उत्पन्न हुई है। वर्षों से प्रशासनिक तंत्र इस समस्या के समाधान में प्रभावी भूमिका निभाने में असफल दिखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि संविधान के तहत गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें यह भी शामिल है कि नागरिक बिना भय के सार्वजनिक स्थलों पर आवागमन कर सकें। यह टिप्पणी इस बात की ओर संकेत करती है कि बहस लंबे समय से केवल पशु अधिकारों तक सीमित रही, जबकि मानव सुरक्षा का पहलू पीछे छूट गया।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की अंधाधुंध कार्रवाई स्वीकार्य नहीं होगी। यूथेनेशिया केवल प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों की जांच और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत ही किया जा सकेगा। यह आदेश संवेदनशीलता और व्यावहारिकता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास माना जा रहा है। साथ ही अदालत ने स्थानीय निकायों और राज्यों की उस विफलता पर भी चिंता जताई है, जिसके चलते पशु जन्म नियंत्रण नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सका। नसबंदी, टीकाकरण और आश्रय गृहों की व्यवस्था अधिकांश स्थानों पर कागजों तक सीमित रही है।
दरअसल, आवारा कुत्तों की समस्या अब केवल पशु प्रबंधन का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर संकट बन चुकी है। शहरों में बढ़ता कचरा, खुले डंपिंग स्थल और भोजन की सहज उपलब्धता ने इनकी संख्या में तेजी से वृद्धि की है। वहीं, स्थानीय निकायों के पास संसाधनों और स्पष्ट नीति का अभाव स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
अदालत ने अब राज्यों को प्रत्येक जिले में पशु जन्म नियंत्रण केंद्र स्थापित करने, रेबीज रोधी दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने जैसे निर्देश दिए हैं। हालांकि इन आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सबसे बड़ी चुनौती जमीनी स्तर पर व्यवस्था लागू करने की होगी, क्योंकि पहले भी कई निर्देश व्यवहार में सीमित रह चुके हैं।
मानव सभ्यता की परिभाषा केवल पशुओं के प्रति संवेदनशीलता तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि इसमें मनुष्य की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। यदि बच्चे स्कूल जाने में असुरक्षित महसूस करें, बुजुर्ग सार्वजनिक स्थानों से दूरी बनाने लगें और नागरिक हर मार्ग पर भय के साथ चलें, तो यह किसी भी विकसित समाज के लिए गंभीर संकेत है। ऐसे में आवश्यकता है कि सरकारें केवल भावनात्मक बहसों से आगे बढ़कर व्यावहारिक और संतुलित नीति लागू करें, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जा रहा है।





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