आंध्र प्रदेश, 21 मई।
आंध्र प्रदेश में जनसंख्या नीति को लेकर एक बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां राज्य सरकार ने अब तीसरे और चौथे बच्चे के जन्म पर नकद प्रोत्साहन देने का निर्णय लिया है। श्रीकाकुलम में की गई घोषणा के अनुसार तीसरे बच्चे पर 30 हजार रुपये और चौथे बच्चे पर 40 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
यह वही राज्य है, जहां कभी “दो बच्चों” की नीति को सख्ती से लागू करने की दिशा में कदम उठाए गए थे, लेकिन अब परिस्थितियां बदलने के साथ सरकार का रुख भी पूरी तरह परिवर्तित होता दिख रहा है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि कई राज्यों में अब जनसंख्या वृद्धि को चुनौती के बजाय आवश्यकता के रूप में देखा जाने लगा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार आंध्र प्रदेश की कुल प्रजनन दर 1.7 तक पहुंच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से काफी नीचे है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आने वाले वर्षों में कार्यशील आबादी घटने और वृद्ध जनसंख्या बढ़ने की आशंका है।
इसी पृष्ठभूमि में दक्षिण भारत के कई राज्यों में जनसंख्या वृद्धि को लेकर नई राजनीतिक और आर्थिक सोच विकसित हो रही है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि आगामी परिसीमन प्रक्रिया, जो 2026 के बाद प्रस्तावित है, 2021 की जनगणना के आधार पर होगी, जिससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है।
बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रजनन दर अभी भी 2.5 से अधिक बनी हुई है, जबकि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और हिमाचल जैसे राज्यों में यह काफी नीचे आ चुकी है। ऐसे में दक्षिणी राज्यों में यह चिंता बढ़ रही है कि भविष्य में लोकसभा सीटों का संतुलन उनके खिलाफ जा सकता है।
इस स्थिति ने जनसंख्या को केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व से जुड़ा विषय बना दिया है। जनसंख्या वृद्धि और घटती आबादी अब राज्यों के बीच नीति और शक्ति संतुलन का हिस्सा बनती जा रही है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नकद प्रोत्साहन से जन्मदर में स्थायी वृद्धि संभव नहीं है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के उदाहरण बताते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, महिला रोजगार और बाल देखभाल जैसी व्यवस्थाएं अधिक प्रभावी होती हैं।
ऐसे में चेतावनी दी जा रही है कि यदि केवल संख्यात्मक वृद्धि पर जोर दिया गया तो भविष्य में आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ सकता है। जनसंख्या नीति का वास्तविक उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वस्थ, शिक्षित और सक्षम नागरिकों का निर्माण होना चाहिए।





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