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21 May, 2026

मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर में ऐतिहासिक गिरावट, 10 साल में बड़ा सुधार

मध्य प्रदेश में बीते एक दशक में शिशु मृत्यु दर में 17 अंकों की कमी दर्ज की गई है, जिसे स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, नवजात देखभाल और डिजिटल तकनीक के बेहतर उपयोग का परिणाम माना जा रहा है।

भोपाल, 21 मई ।

मध्य प्रदेश ने शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज करते हुए बीते एक दशक में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2014 में प्रति हजार जीवित जन्म पर 52 दर्ज की गई शिशु मृत्यु दर घटकर वर्ष 2024 में 35 तक पहुंच गई है। स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, नवजात देखभाल इकाइयों की मजबूती और तकनीकी नवाचारों ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

जनसंपर्क अधिकारी अंकुश मिश्रा ने गुरुवार को जानकारी देते हुए बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के चलते प्रदेश ने शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया है।

भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम रिपोर्ट 2024 के अनुसार मध्य प्रदेश की शिशु मृत्यु दर वर्ष 2014 में 52 प्रति हजार जीवित जन्म थी, जो वर्ष 2024 में घटकर 35 रह गई। इस दौरान प्रदेश में 17 अंकों की कमी दर्ज की गई है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की स्थिति मजबूत हुई है। इसे स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण, प्रभावी रणनीतियों और लक्षित हस्तक्षेपों का परिणाम माना जा रहा है।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में शिशु मृत्यु दर 50 रही। वर्ष 2016 और 2017 में यह 47 दर्ज की गई, जबकि 2018 में मामूली बढ़कर 48 हो गई थी। इसके बाद लगातार गिरावट का क्रम बना रहा और वर्ष 2019 में यह 46, वर्ष 2020 में 43, वर्ष 2021 में 41, वर्ष 2022 में 40 तथा वर्ष 2023 में 37 दर्ज की गई। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा घटकर 35 प्रति हजार जीवित जन्म पर पहुंच गया।

प्रदेश में नवजात और शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए 62 विशेष नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों, 200 नवजात शिशु स्थिरीकरण इकाइयों और मातृ-नवजात देखभाल इकाइयों का विस्तार किया गया है। यहां “जीरो सेपरेशन” मॉडल के तहत मां और नवजात की संयुक्त देखभाल, शीघ्र स्तनपान और कंगारू मदर केयर को बढ़ावा दिया जा रहा है।

डिजिटल तकनीक के उपयोग के तहत ई-शिशु पहल के माध्यम से मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों की नवजात इकाइयों को विशेषज्ञ टेली-मेंटोरिंग से जोड़ा गया है। साथ ही विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए उच्च जोखिम वाले मामलों की पहचान, नवजात निगरानी और डेटा आधारित निर्णय प्रणाली को और प्रभावी बनाया गया है।

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