कोलकाता, 21 मई ।
पूर्वी हिमालय के जैव विविधता क्षेत्र में अत्यंत दुर्लभ और विलुप्ति की कगार पर पहुंचे एक पौधे की 188 वर्ष बाद पुनर्खोज हुई है, जिसकी पुष्टि पर आधारित शोध जर्मनी की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
यह शोधपत्र “वैक्सीनियम पिलिफेरम की पुनर्खोज : पूर्वी हिमालय जैव विविधता क्षेत्र की एक विलुप्तप्राय प्रजाति” शीर्षक से फेडेस रेपर्टोरियम—जर्नल ऑफ बॉटनिकल टैक्सोनॉमी एंड जियोबॉटनी में प्रकाशित हुआ, जिसे उच्च प्रभाव वाली अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका माना जाता है।
जानकारी के अनुसार अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले के विजयनगर क्षेत्र के आसपास अक्टूबर 2024 में वनस्पति विज्ञान के छात्र एवं शोधकर्ता विनय कुमार साहनी ने इस दुर्लभ पौधे का नमूना एकत्र किया था, जिसके बाद विशेषज्ञ डॉ. सुभाषिस पांडा ने इसकी पहचान वैक्सीनियम पिलिफेरम के रूप में की।
डॉ. पांडा ने इस पौधे पर विस्तृत अध्ययन कर शोधपत्र तैयार किया और इसके सह-लेखक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि उन्होंने बताया कि इस प्रजाति को पहली बार 26 नवंबर 1836 को ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक विलियम ग्रिफिथ ने मिश्मी पर्वतीय क्षेत्र से खोजा था।
इसके बाद लगभग 188 वर्षों तक इस पौधे का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला और इसे विलुप्तप्राय माना जाता रहा, जिससे यह खोज और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
विशेष रूप से डॉ. पांडा और उनकी टीम ने इस पौधे को फूल और फल दोनों अवस्थाओं में एक साथ दर्ज किया, जिसे वैज्ञानिक जगत में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पुनर्खोज से इस दुर्लभ प्रजाति के संरक्षण, ऊतक संवर्धन अनुसंधान और पारिस्थितिकी अध्ययन के नए रास्ते खुलेंगे, जिससे इसके अस्तित्व को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।






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