नई दिल्ली, 22 मई।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज प्रकृति और मानव प्रगति के बीच के गहरे संबंध को रेखांकित करते हुए एक प्रेरणादायक संदेश साझा किया। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से एक प्राचीन संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए विकास के ऐसे मॉडल का आह्वान किया, जिसमें पर्यावरण और समाज दोनों का साथ-साथ उत्थान हो।
प्रधानमंत्री ने श्लोक के भाव को स्पष्ट करते हुए कहा कि जिस प्रकार एक वनस्पति अपनी हजारों शाखाओं के साथ फलती-फूलती है, उसी तरह मानव समाज को भी समृद्धि के नए शिखर छूने चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि प्रकृति को विकसित करने वाली दिव्य शक्ति का उद्देश्य केवल स्वयं का विस्तार नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी मार्ग प्रशस्त करना है।
इस सुभाषित के जरिए प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि विकास की कोई भी नीति तभी सार्थक है जब वह प्रकृति के संरक्षण और जन-जन की भलाई का संगम हो। उनका यह विचार एक ऐसे समृद्ध भारत के विजन को दर्शाता है, जहाँ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही प्रगति का आधार स्तंभ है।






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