कोलकाता, 22 मई।
झारखंड के चाकुलिया क्षेत्र की गोशाला में ब्रह्ममुहूर्त के समय से ही गतिविधियों की रफ्तार तेज हो जाती है, जहां सुबह की शुरुआत के साथ ही गोबर से जैविक खाद तैयार करने और गोमूत्र से हर्बल औषधियों के निर्माण का कार्य प्रारंभ हो जाता है।
यह स्थान अब केवल एक पारंपरिक गोशाला नहीं रह गया है, बल्कि इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव की प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
यहां गोशाला को दान पर निर्भर व्यवस्था के बजाय उत्पादन और रोजगार आधारित इकाई के रूप में बदलने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि यह ग्रामीण युवाओं के लिए आजीविका का केंद्र बन सके।
देश के विभिन्न हिस्सों से आए युवाओं को प्रशिक्षण देकर यह सिखाया जा रहा है कि गोबर और गोमूत्र जैसे प्राकृतिक संसाधनों से जैविक खाद, कीटनाशक, बायोगैस और हर्बल उत्पाद तैयार कर किस तरह आर्थिक गतिविधियां विकसित की जा सकती हैं।
कार्यक्रम संचालकों के अनुसार ग्रामीण विकास की वास्तविक नींव गांवों में ही निहित है, जहां कृषि लागत कम करने के लिए रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर प्राकृतिक उपायों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।
इसके साथ ही आयुर्वेद और पंचगव्य आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को प्रोत्साहन देने, बायोगैस के माध्यम से ऊर्जा आत्मनिर्भरता, गो-उत्पादों से रोजगार सृजन और वैज्ञानिक पशुपालन को बढ़ावा देने जैसे क्षेत्रों पर कार्य किया जा रहा है।
देश में लगभग बीस हजार गोशालाएं मौजूद हैं, और यदि प्रत्येक गोशाला आसपास के गांवों की जिम्मेदारी संभाले तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव संभव बताया जा रहा है।
गांवों से हो रहे पलायन को रोकने के उद्देश्य से यह पहल युवाओं को अपने क्षेत्र में ही रोजगार उपलब्ध कराने पर केंद्रित है, जहां प्रशिक्षित युवाओं को विभिन्न गोशालाओं में कार्य का अवसर मिल सकता है।
योग्यता के आधार पर इन कार्यकर्ताओं को पंद्रह से पच्चीस हजार रुपये तक मानदेय देने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है, जिससे सेवा के साथ आत्मनिर्भरता का मॉडल विकसित किया जा सके।
यह मॉडल अन्य गोशालाओं तक विस्तार के लिए भी तैयार किया जा रहा है, जिसमें प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में इसे लागू करने की योजना बनाई जा रही है।
यह पहल केवल गोपालन तक सीमित न होकर ग्रामीण परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को मजबूत आधार देने का प्रयास मानी जा रही है, जिसमें गौ आधारित व्यवस्था को विकास की मुख्य धुरी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।




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