राजनीति
23 May, 2026

खादी केवल वस्त्र नहीं, जीवन दर्शन और आत्मनिर्भरता का प्रतीक: बसवप्रभु होसकेरी

बसवप्रभु होसकेरी ने खादी को जीवन दर्शन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह केवल कपड़ा नहीं बल्कि समाज, कारीगरों और किसानों को सीधे जोड़ने वाली संपूर्ण आर्थिक विचारधारा है।

धारवाड़, 23 मई।

बसवप्रभु होसकेरी ने कहा है कि खादी को केवल वस्त्र के रूप में देखना सही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक समग्र विचारधारा, आर्थिक-सामाजिक दृष्टि और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि खादी की खरीद केवल कपड़ा लेना नहीं, बल्कि कातने वाले, बुनकर, किसान और ग्रामीण समाज के जीवन को सहयोग देने की प्रक्रिया है।

उन्होंने गांधी विचार, खादी परंपरा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय ध्वज निर्माण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि खादी के पीछे राष्ट्रीयता, स्वावलंबन और मानवीय मूल्यों की गहरी सोच निहित है, जिसे केवल वस्त्र तक सीमित नहीं किया जा सकता।

होसकेरी ने बताया कि छात्र जीवन से ही वे खादी के प्रति समर्पित रहे हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और बाद में गांधी शांति प्रतिष्ठान से संपर्क के बाद उनके जीवन में खादी के प्रति गहरी प्रतिबद्धता विकसित हुई, जिसके चलते वे आज तक केवल खादी ही धारण करते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि धारवाड़ तालुक के गरग गांव स्थित केंद्र भारतीय मानक ब्यूरो से मान्यता प्राप्त राष्ट्रध्वज निर्माण केंद्र है और यह हाथ से बुने राष्ट्रीय ध्वज बनाने वाले देश के चुनिंदा केंद्रों में शामिल है।

उन्होंने कहा कि 1975 में केवल दो स्थानों को यह अनुमति मिली थी, जिनमें महाराष्ट्र का उदगीर और कर्नाटक का गरग केंद्र शामिल था, तथा इस पहचान को स्थापित करने में शंकरराव कुर्तकोटी की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिन्होंने खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग से यह कार्य जिम्मेदारी के रूप में दिलाया।

होसकेरी ने गर्व व्यक्त करते हुए बताया कि गरग केंद्र में बने राष्ट्रध्वज राष्ट्रपति भवन, संसद, लाल किला, उच्चतम न्यायालय, विभिन्न विधानसभाओं, सैन्य प्रतिष्ठानों और भारतीय दूतावासों पर फहराए जाते हैं, जो पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय है।

उन्होंने बताया कि इस केंद्र में प्रतिवर्ष हजारों मीटर खादी कपड़े का उत्पादन होता है, जिसमें अधिकांश हिस्सा राष्ट्रध्वज निर्माण में उपयोग होता है और आसपास के कई गांवों के बुनकर एवं कातने वाले इससे जुड़े हैं, जिससे करोड़ों रुपये का वार्षिक कारोबार होता है।

उन्होंने ध्वज निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें विशेष प्रकार की कपास, निश्चित बुनाई मानक और वजन संतुलन का पालन किया जाता है, तथा तैयार ध्वजों को विभिन्न आकारों में बनाकर देशभर में भेजा जाता है।

महात्मा गांधी पर विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि गांधी केवल व्यक्ति नहीं बल्कि सत्य, अहिंसा और मानवता की विचारधारा हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को जन आंदोलन का स्वरूप दिया और संघर्ष के नए मार्ग दिखाए।

खादी की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल वस्त्र नहीं बल्कि एक संपूर्ण आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें ग्रामीण रोजगार, आत्मनिर्भरता और सामाजिक संतुलन की भावना शामिल है।

उन्होंने आगे कहा कि खादी से प्राप्त आय का बड़ा हिस्सा सीधे कारीगरों और बुनकरों तक पहुंचता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और पलायन को रोकने में मदद मिलती है, साथ ही यह देश की आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बनता है।

अंत में उन्होंने कहा कि खादी धारण करना केवल परिधान नहीं, बल्कि मानवता, स्वावलंबन और ग्रामीण जीवन मूल्यों से जुड़ने का प्रतीक है।

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