नई दिल्ली, 23 मई।
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में जारी अवमानना नोटिस ने एक गंभीर प्रश्न को रेखांकित किया है कि लोकतंत्र में असहमति और संस्थागत अविश्वास के मध्य सीमा रेखा को समझना क्यों महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान की वास्तविक शक्ति न्यायपालिका में जनता का अटूट विश्वास है। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान एक अनिवार्य तत्व है, परंतु जब यह असहमति अविश्वास में परिवर्तित होकर न्यायिक संस्थाओं को लक्षित करती है, तब लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर होने लगता है।
शराब घोटाला मामले में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को बदलने की मांग, राजघाट पर प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर हुई तीखी बहस के पश्चात न्यायालय ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह को अवमानना नोटिस जारी किया है। यद्यपि संबंधित न्यायाधीश ने स्वयं को प्रकरण से अलग कर लिया है, किंतु न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि न्यायिक मर्यादा सर्वोपरि है। यह घटना केवल एक विशिष्ट प्रकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक चुनौती को दर्शाती है जहाँ न्यायिक निर्णयों की आलोचना और संस्था की अखंडता पर प्रहार के मध्य का अंतर धुंधला हो रहा है।
संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत न्यायाधीशों के निर्णयों पर तार्किक बहस करना और अपील का मार्ग चुनना लोकतंत्र का एक सकारात्मक स्वरूप है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब बहस निर्णयों से हटकर न्यायाधीश की नीयत पर केंद्रित हो जाती है। आम आदमी पार्टी का उदय एक जनांदोलन के माध्यम से हुआ है, अतः व्यवस्था पर प्रश्न उठाना इसका स्वभाव रहा है, परंतु शासन के दायित्व और सड़क पर होने वाले आंदोलनों की कार्यप्रणाली में स्पष्ट अंतर है। न्यायपालिका सरकार, विपक्ष और मीडिया के दबाव से परे हटकर केवल संविधान के आधार पर निर्णय लेती है। वर्तमान में आस्था, आरक्षण और पर्यावरण जैसे अनेक जटिल विषयों पर सरकारें जब राजनीतिक विवशता में मौन रहती हैं, तब न्यायपालिका ही संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण का मार्ग प्रशस्त करती है।
यदि प्रत्येक निर्णय के पश्चात न्यायाधीशों की मंशा पर प्रश्न उठाए जाएंगे, तो न्यायिक स्वतंत्रता बाधित होगी। सर्वोच्च न्यायालय से अधीनस्थ न्यायालय तक प्रत्येक न्यायाधीश संविधान के प्रति शपथबद्ध है। न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी त्रुटि के समाधान हेतु निश्चित आचार संहिता और आंतरिक व्यवस्था विद्यमान है। संस्थाओं पर भरोसा ही लोकतंत्र का सुरक्षा कवच है। एक संस्था पर अविश्वास की भावना अन्य लोकतांत्रिक अंगों को भी निर्बल करती है। अतः न्यायपालिका को विचारधाराओं के विभाजन से दूर रखना ही बुद्धिमत्ता है।
सोशल मीडिया के युग में जब न्यायाधीशों के व्यक्तिगत जीवन और परिवारों को लक्षित किया जाता है, तो यह प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक हो जाती है। न्यायिक पदों का सम्मान व्यक्तियों का नहीं, बल्कि संविधान का सम्मान है। समाधान संवाद, सुधार और संयम में निहित है। असहमति को संस्थागत मार्ग (जैसे रिव्यू या क्यूरेटिव पिटीशन) के माध्यम से व्यक्त करना चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर 'ट्रायल' चलाकर। न्यायपालिका को सुदृढ़ करने के लिए नियुक्तियों और तकनीकी सुधारों पर रचनात्मक विमर्श आवश्यक है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी का कर्तव्य है कि वे न्यायालय की मर्यादा को अक्षुण्ण रखें। अंततः, विश्वास ही हमारी अंतिम पूंजी है; यदि न्याय के द्वार पर ही अविश्वास की दीवार खड़ी हो गई, तो लोकतंत्र का अस्तित्व मात्र कागजी रह जाएगा।












