संपादकीय
23 May, 2026

आतंकवाद पर कड़ा प्रहार और तकनीक पर साझी उड़ान: भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन ने बदले कूटनीतिक समीकरण

भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक एकजुटता और हरित ऊर्जा, तकनीक तथा रक्षा क्षेत्र में साझा रणनीतियों पर सहमति बनी, जो भारत की बढ़ती कूटनीतिक धमक को प्रदर्शित करती है।

नई दिल्ली, 23 मई।

नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड और स्वीडन के साथ आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन ने आतंकवाद के विरुद्ध और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में एक साझा रणनीति को नई दिशा प्रदान की है। वैश्विक स्तर पर दो खेमों में विभाजित विश्व के मध्य भारत ने अपनी कूटनीति की एक नई रेखा खींची है। नॉर्वे में आयोजित इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने नॉर्डिक देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ आतंकवाद, तकनीक और व्यापार के मुद्दों पर जिस मुखरता से अपना पक्ष रखा, उसने सिद्ध कर दिया कि नई दिल्ली अब केवल वक्तव्य नहीं देती, बल्कि वैश्विक एजेंडा निर्धारित करने की क्षमता रखती है।

बैठक का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया, जब प्रधानमंत्री ने पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में नॉर्डिक देशों के समक्ष रखा कि आतंकवाद का पोषण करने वाले देशों को अब इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यह संकेत स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की ओर था। नॉर्डिक देशों ने एक स्वर में इस बर्बर हमले की निंदा की और भारत के साथ एकजुटता प्रदर्शित की। नॉर्डिक समूह ने आतंकवाद को एक वैश्विक महामारी स्वीकार किया है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स में पाकिस्तान को ग्रे-लिस्ट में रखने से लेकर आतंकी वित्तपोषण पर अंकुश लगाने तक, इन पाँच देशों का समर्थन भारत की एक बड़ी रणनीतिक विजय है। यूरोप के इन देशों ने पूर्व के कूटनीतिक संतुलन से ऊपर उठकर सिद्धांतों का पक्ष लिया है, जो कि एक ऐतिहासिक परिवर्तन है।

प्रधानमंत्री ने भारत-नॉर्डिक संबंधों को नवाचार, अनुसंधान और जन-जुड़ाव का नाम दिया है। हरित तकनीक के क्षेत्र में नॉर्वे और स्वीडन हाइड्रोजन ऊर्जा में अग्रणी हैं, जबकि डेनमार्क पवन ऊर्जा का बड़ा केंद्र है। फिनलैंड ने सर्कुलर इकोनॉमी में विशेष दक्षता हासिल की है। भारत ने इनके साथ मिलकर वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा का लक्ष्य साझा किया है। यह केवल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक हस्तांतरण का भी है। स्वीडन की कंपनियां भारत में ग्रीन स्टील प्लांट स्थापित करेंगी और डेनमार्क के साथ अपतटीय पवन ऊर्जा पर समझौता हुआ है। यह साझेदारी भारत को ग्रीन सुपरपावर बनाने की नींव रख सकती है।

डिजिटल और एआई क्षेत्र में भी यह सम्मेलन मील का पत्थर सिद्ध हुआ। फिनलैंड 6G तकनीक में विश्व में अग्रणी है, वहीं भारत ने यूपीआई और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अपना सफल मॉडल प्रस्तुत किया। अब दोनों पक्ष मिलकर डिजिटल कॉरिडोर का निर्माण करेंगे। इसके अतिरिक्त, नॉर्वे के साथ ब्लू इकोनॉमी, गहरे समुद्र में खनन और आर्कटिक अनुसंधान पर कार्य किया जाएगा। भारत आर्कटिक काउंसिल में पर्यवेक्षक है, और यह साझेदारी भारत को ध्रुवीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर देगी।

नॉर्डिक देशों का आर्थिक ब्लॉक 100 बिलियन डॉलर से अधिक जीडीपी वाला है, किंतु भारत के साथ व्यापारिक संबंध अभी भी अपनी क्षमता से कम हैं। इस अंतर को मिटाने के लिए ईएफटीए ट्रेड डील को शीघ्र लागू करने पर सहमति बनी है। आइसलैंड की जियोथर्मल तकनीक, स्वीडन का रक्षा क्षेत्र और डेनमार्क का खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र भारत के लिए नए अवसर उत्पन्न कर सकते हैं। यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब चीन यूरोप में अपना प्रभाव विस्तार कर रहा है। नॉर्डिक देशों में चीन के 5G और पोर्ट निवेश को लेकर व्याप्त आशंकाओं के बीच, भारत ने स्वयं को आपूर्ति श्रृंखला के एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में स्थापित किया है।

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख शांति और कूटनीति के प्रति अडिग रहा है। नॉर्डिक देशों ने भारत की भूमिका को सेतु निर्माता के रूप में सराहा है। यह संतुलन भारत की सामरिक शक्ति है कि वह पश्चिम से संवाद कर सकता है, रूस से ऊर्जा खरीद सकता है और साथ ही ग्लोबल साउथ की आवाज भी बन सकता है। नॉर्डिक मॉडल इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि ये देश आकार में छोटे होने के बावजूद वैश्विक प्रभाव में बहुत बड़े हैं। इन देशों की शक्ति केवल उनकी जीडीपी नहीं, बल्कि उनकी तकनीक और उच्च मूल्य आधारित नीतियां हैं।

शिखर सम्मेलन की सफलता अब डिलीवरी पर निर्भर करेगी। ईएफटीए डील का कार्यान्वयन, नॉर्डिक कंपनियों के लिए भारत में सिंगल विंडो क्लीयरेंस और छात्र-पेशेवर आदान-प्रदान को सुगम बनाना भविष्य की मुख्य चुनौतियां हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह केवल एक बाजार नहीं, बल्कि मिशन का साझीदार है। वह तकनीक का आकांक्षी है, किंतु मेक इन इंडिया की शर्तों से समझौता नहीं करेगा। निवेश आवश्यक है, किंतु डेटा संप्रभुता की कीमत पर नहीं। यह बैठक तप्त वैश्विक राजनीति के बीच भारत की नई कूटनीति का प्रमाण है। यहाँ बराबरी की मेज पर आतंकवाद को ललकारा गया और तकनीक को अपनाया गया। विश्व को समझना होगा कि भारत अब केवल सुनने नहीं, बल्कि सुनाने की स्थिति में है।

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