भोपाल, 23 मई।
उच्चतम न्यायालय की सख्त फटकार के बाद भी मध्य प्रदेश के जिला अस्पतालों में आईसीयू व्यवस्था बदहाल है। एक ओर जहाँ भीषण गर्मी से जनजीवन त्रस्त है, वहीं स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी सच्चाई यह है कि जिस आईसीयू को मरीजों की जान बचानी थी, वह स्वयं वेंटिलेटर पर है। मध्य प्रदेश में पारा 47 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया है। हीटवेव (लू) के कारण न केवल मनुष्य बल्कि बेजुबान पक्षी भी काल के गाल में समा रहे हैं, किंतु सरकारी अस्पतालों का तंत्र संवेदनहीन बना हुआ है।
उच्चतम न्यायालय ने 25 अप्रैल को सभी राज्यों को आईसीयू व्यवस्था में सुधार लाने, न्यूनतम मानक निर्धारित करने और कार्ययोजना बनाने का स्पष्ट आदेश दिया था। परंतु, ज़मीनी हकीकत अत्यंत भयावह है। 'पत्रिका' की पड़ताल में मध्य प्रदेश के जिला अस्पतालों की जो तस्वीर सामने आई है, वह पूरी तरह से व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है। राजगढ़ के 300 बेड वाले नए जिला अस्पताल में दो आईसीयू (मेडिसिन और पीआईसीयू) हैं, लेकिन कुशल स्टाफ के अभाव में वेंटिलेटर ताले में कैद हैं। नागदा शासकीय अस्पताल में सीएसआर (CSR) फंड से बना 5 बेड का आईसीयू पिछले 8 वर्षों से बंद पड़ा है। यहाँ प्रशिक्षित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी के चलते गंभीर मरीजों को उज्जैन रेफर करना मजबूरी बन गया है। इसी प्रकार, हरदा में करोड़ों की लागत से बना 10 बेड का आईसीयू स्थायी स्टाफ की प्रतीक्षा में है। खंडवा और भोपाल के अस्पतालों में भी फायर सेफ्टी, गोपनीयता (Privacy) और संक्रमण नियंत्रण जैसे बुनियादी मानकों का अभाव है। इंदौर का 300 बेड वाला नया अस्पताल सात वर्षों से निर्माणधीन है, जहाँ मरीज अभी भी फर्श पर इलाज कराने को मजबूर हैं।
यह स्थिति स्वास्थ्य व्यवस्था की तीन बड़ी 'हत्याओं' के समान है। प्रथम, विशेषज्ञों और स्टाफ की भारी कमी है, क्योंकि प्रदेश में विशेषज्ञों के 60 प्रतिशत और नर्सिंग स्टाफ के 45 प्रतिशत पद रिक्त हैं। द्वितीय, जवाबदेही का पूर्ण अभाव है; नागदा जैसे मामलों में किसी भी अधिकारी पर जिम्मेदारी तय नहीं की गई। तृतीय, मरीज के भरोसे का कत्ल है। गरीब व्यक्ति अस्पताल को आशा की किरण मानकर आता है, लेकिन उसे रेफरल के नाम पर लंबी यात्रा के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे रास्ते में ही उसकी सांसें उखड़ जाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने वेंटिलेटर, मॉनिटर, प्रशिक्षित स्टाफ, 24x7 बिजली-पानी और संक्रमण नियंत्रण को अनिवार्य बताया था। स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा वेतन और भत्तों में व्यय हो जाता है, किंतु मशीनों के रख-रखाव और स्टाफ की नियुक्ति की कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है। भीषण गर्मी ने इस स्वास्थ्य इमरजेंसी की पोल खोल दी है। प्राइवेट अस्पतालों के भारी-भरकम बिल गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हैं।
अब केवल आश्वासनों से काम नहीं चलेगा, त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है:
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प्रत्येक कलेक्टर को 30 दिनों के भीतर अपने जिले के आईसीयू को पूरी तरह संचालित करने का लक्ष्य दिया जाए।
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लक्ष्य में विफल रहने वाले अधिकारियों पर जवाबदेही तय हो।
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संविदा के स्थान पर स्थायी भर्ती की जाए।
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पीजी डॉक्टरों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा अनिवार्य हो।
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सीएसआर के तहत आईसीयू निर्माण करने वाली कंपनियों को पांच वर्षों तक स्टाफ का खर्च उठाने का अनुबंध करना चाहिए।
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प्रत्येक आईसीयू का लाइव डैशबोर्ड जनता के लिए उपलब्ध हो ताकि खाली बेड और बंद मशीनों का सच सार्वजनिक हो सके।
उच्चतम न्यायालय ने मार्गदर्शन प्रदान कर दिया है, अब गेंद सरकार के पाले में है। यदि अस्पतालों के आईसीयू इसी प्रकार तालों में बंद रहे, तो यह विडंबना ही होगी कि व्यवस्था के रक्षक ही भक्षक बन जाएंगे। स्वास्थ्य मंत्री महोदय, आपके आईसीयू को अब स्वयं इलाज की आवश्यकता है। इसे अविलंब वेंटिलेटर से उतारकर क्रियाशील बनाइए, अन्यथा जनता आपको सत्ता से उतारने में संकोच नहीं करेगी।





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