संपादकीय
23 May, 2026

POCSO के 88% मामलों में आरोपी बरी, एक साल में 331 में से सिर्फ 40 को सजा, इंसाफ के रास्ते में कहां अटक रही न्याय व्यवस्था

पॉक्सो कानून के अंतर्गत दोषमुक्ति की उच्च दर का विश्लेषण करते हुए यह लेख न्यायिक प्रक्रियाओं, जांच संबंधी खामियों और सामाजिक जटिलताओं के मध्य संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भोपाल, 23 मई।

“बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण” यानी POCSO एक्ट को देश के सबसे सख्त कानूनों में माना जाता है। इसका मकसद साफ था — बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में त्वरित जांच और कड़ी सजा सुनिश्चित करना। लेकिन भोपाल से सामने आई एक रिपोर्ट इस कानून की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पिछले एक साल में भोपाल में POCSO के तहत दर्ज 331 मामलों में से 291 में आरोपी बरी हो गए। यानी 88 प्रतिशत मामलों में सजा नहीं हो सकी। सिर्फ 40 मामलों में ही दोषियों को सजा मिली।

यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। सवाल यह है कि जब कानून इतना सख्त है, तो इतनी बड़ी संख्या में आरोपी छूट कैसे रहे हैं? क्या कानून में खामी है या जांच और न्याय व्यवस्था में? रिपोर्ट के अनुसार, भोपाल में POCSO के तहत दर्ज 331 मामलों में से अधिकांश में अदालतों को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। सबसे ज्यादा मामले कोलार थाना क्षेत्र से जुड़े रहे, जहां 33 मामलों में फैसला आया लेकिन केवल 3 में सजा हुई। निशातपुरा और हबीबगंज में भी स्थिति लगभग ऐसी ही रही।

सबसे अहम बात यह सामने आई कि 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में लड़की के बालिग होने के बाद दिए गए बयान के आधार पर आरोपियों को राहत मिली। ज्यादातर मामले ऐसे निकले, जिनमें नाबालिग लड़की अपने प्रेमी के साथ घर छोड़कर चली गई थी। परिवार ने अपहरण और POCSO की धाराओं में केस दर्ज करा दिया। जब तक पुलिस लड़की को बरामद करती, वह बालिग हो चुकी होती। अदालत में लड़की कहती कि वह अपनी मर्जी से गई थी और उसने शादी कर ली है। ऐसे में अदालत के सामने आरोपी को बरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

एक मामले में 11 सितंबर 2021 को पीड़िता की मां ने तलैया थाने में बेटी के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई। 15 सितंबर को आरोपी पर POCSO का मामला दर्ज हुआ। लेकिन अदालत में पीड़िता ने बयान दिया कि वह परिवार के दबाव से बचने के लिए आरोपी के साथ गई थी। इसी तरह अयोध्या नगर थाना क्षेत्र में 2018 में एक 17 वर्षीय लड़की की आत्महत्या के मामले में डीएनए जांच से गैंगरेप की पुष्टि हुई थी, लेकिन पीड़िता के न होने और गवाहों के मुकर जाने के कारण आरोपी बरी हो गए।

इन मामलों से साफ है कि सिर्फ कानून सख्त बना देने से न्याय सुनिश्चित नहीं होता। जांच की गुणवत्ता, गवाहों की सुरक्षा और सामाजिक परिस्थितियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। POCSO एक्ट में प्रावधान है कि जांच एक साल में पूरी हो और ट्रायल भी एक साल के भीतर खत्म हो, लेकिन कई मामलों में समय पर चार्जशीट तक दाखिल नहीं हो पाती। मेडिकल जांच, फॉरेंसिक रिपोर्ट और डीएनए साक्ष्य जुटाने में देरी होती है। कई बार पीड़ित और गवाह सामाजिक दबाव या डर के कारण बयान बदल देते हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 60 प्रतिशत से अधिक मामलों में आरोपी पीड़िता का परिचित, रिश्तेदार या पड़ोसी था। गांव और समाज में बदनामी के डर से परिवार समझौता कर लेते हैं। लड़की के बालिग होते ही शादी करवा दी जाती है और केस कमजोर पड़ जाता है। यही वजह है कि कानून का उद्देश्य और उसका वास्तविक उपयोग कई बार अलग दिशा में चले जाते हैं।

यह कहना गलत होगा कि POCSO एक्ट विफल हो गया है। असल समस्या इसके गलत इस्तेमाल और सामाजिक जटिलताओं की है। कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना था, न कि हर सहमति वाले किशोर संबंध को अपराध की श्रेणी में डालना। सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह टिप्पणी कर चुका है कि 16 से 18 वर्ष की उम्र के बीच सहमति से बने संबंधों को लेकर संवेदनशील दृष्टिकोण जरूरी है। लेकिन कानून में स्पष्ट संशोधन न होने के कारण पुलिस को मजबूरन POCSO के तहत मामला दर्ज करना पड़ता है।

अब जरूरत संतुलित सुधारों की है। 16 से 18 वर्ष के बीच सहमति से बने संबंधों के लिए “क्लोज-इन-एज एक्सेम्पशन” जैसे प्रावधानों पर गंभीर बहस होनी चाहिए, जैसा कई देशों में लागू है। POCSO मामलों की जांच के लिए विशेष इकाइयां बनाई जाएं। फॉरेंसिक और मेडिकल जांच 30 दिन के भीतर पूरी हो। पुलिस को विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। हर जिले में कम से कम दो फास्ट ट्रैक कोर्ट हों ताकि मामलों का समय पर निपटारा हो सके। गवाह सुरक्षा योजना को प्रभावी तरीके से लागू करना भी जरूरी है।

साथ ही समाज को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। बेटी के घर छोड़कर चले जाने पर हर मामले को अपहरण और यौन अपराध का रूप देना समाधान नहीं है। इससे कई बार दो युवाओं का जीवन बर्बाद हो जाता है और कानून का फोकस असली अपराधियों से हट जाता है।

88 प्रतिशत आरोपी बरी होने का मतलब यह नहीं कि 88 प्रतिशत मामले झूठे थे। इसका अर्थ यह है कि हमारा सिस्टम अभी भी सहमति और अपराध के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से समझने और साबित करने में संघर्ष कर रहा है। POCSO एक्ट बच्चों की सुरक्षा के लिए बना है और यह उद्देश्य कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन निर्दोषों को जेल भेजना भी न्याय नहीं कहा जा सकता। जरूरत इस बात की है कि कानून, जांच और सामाजिक समझ — तीनों के बीच संतुलन बनाया जाए। तभी बच्चों की सुरक्षा और न्याय, दोनों साथ-साथ सुनिश्चित हो सकेंगे।

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