संपादकीय
23 May, 2026

यूपी में गठबंधन की सियासत: कांग्रेस का ‘डबल गेम’ या सीटों की मजबूरी

उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति में कांग्रेस के बदलते रुख और बसपा से तालमेल बिठाने के प्रयासों का विश्लेषण करती है, जो पार्टी की राजनीतिक बेचैनी और सीमित आधार को दर्शाता है।

लखनऊ, 23 मई।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘विश्वास’ का अभाव वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। कांग्रेस के एससी विभाग के अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और सांसद तनुज पुनिया द्वारा बिना पूर्व अनुमति के मायावती के आवास पर पहुंचना, केवल एक अनौपचारिक भेंट का प्रयास नहीं, बल्कि विपक्षी गठबंधन के भीतर व्याप्त अस्थिरता और बेचैनी को दर्शाता है। इस घटना ने राजनीतिक गलियारों में यह बहस छेड़ दी है कि क्या कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में रहते हुए बहुजन समाज पार्टी के साथ भी नए समीकरण बनाने का प्रयास कर रही है।

प्रस्तुत घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पर्दे के पीछे अपनी राजनीतिक पैठ मजबूत करने की कोशिश में थी, किंतु यह प्रयास विफल रहा। मायावती द्वारा कांग्रेस नेताओं से भेंट करने से इनकार करना और उन्हें वापस लौटाना एक कड़ा संदेश है। यह न केवल कांग्रेस के लिए, बल्कि समूचे विपक्ष के लिए एक चेतावनी है कि बसपा अब किसी भी गठबंधन में ‘कनिष्ठ भागीदार’ की भूमिका स्वीकार करने के मूड में नहीं है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी इस प्रकरण पर अपनी असहमति जताते हुए बिना अपॉइंटमेंट जाने की प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण माना है, जो कांग्रेस के भीतर इस रणनीति को लेकर मतभेदों को उजागर करता है।

कांग्रेस की राजनीतिक विवशता भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा था, जहाँ उसे मात्र 2 सीटें प्राप्त हुई थीं। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने पार्टी को 6 सीटें दिलाईं, किंतु कांग्रेस का अपना स्वतंत्र जनाधार अब भी सीमित है। इस स्थिति में कांग्रेस सपा पर अपनी पूर्ण निर्भरता को कम करने और बसपा के दलित वोट बैंक के माध्यम से अपनी सौदेबाजी की क्षमता (Bargaining Power) बढ़ाने के लिए ‘प्लान-बी’ पर कार्य कर रही है।

इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस को दोहरा नुकसान उठाना पड़ा है। समाजवादी पार्टी का कांग्रेस पर से भरोसा डगमगाया है, वहीं बसपा ने भी दूरी बनाए रखी है। वर्तमान घटनाक्रम यह सिद्ध करता है कि उत्तर प्रदेश की गठबंधन आधारित राजनीति में अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए एक सुदृढ़ राजनीतिक आधार का होना अनिवार्य है, जो कि वर्तमान में कांग्रेस के पास अत्यंत सीमित दिखाई देता है। 

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