नॉर्वे, 23मई।
वैश्विक व्यवस्था के दो ध्रुवों में बंटी दिख रही दुनिया के बीच भारत ने अपनी कूटनीतिक दिशा को नया स्वर देते हुए नॉर्वे में आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में आतंकवाद, तकनीक और व्यापार जैसे प्रमुख मुद्दों पर स्पष्ट और निर्णायक रुख अपनाया, जिससे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समीकरणों में महत्वपूर्ण बदलाव के संकेत मिले हैं।
सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड और स्वीडन के शीर्ष नेतृत्व के साथ आतंकवाद, तकनीकी सहयोग और आर्थिक साझेदारी पर विस्तार से चर्चा की और यह संदेश दिया कि भारत अब केवल परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडा तय करने की क्षमता रखने वाला राष्ट्र बन चुका है।
बैठक का प्रमुख क्षण तब सामने आया जब प्रधानमंत्री ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि आतंकवाद को संरक्षण देने वाले देशों को इसकी कीमत चुकानी होगी, जिसे सीधे तौर पर पाकिस्तान के संदर्भ में देखा गया, और इस पर नॉर्डिक देशों ने एकजुट होकर न केवल हमले की निंदा की बल्कि आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता भी जताई।
नॉर्डिक देशों ने यह स्वीकार किया कि आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक चुनौती बन चुका है, और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स जैसे मंचों पर पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखने तथा आतंकी वित्तपोषण रोकने के मुद्दों पर उनका समर्थन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है।
परंपरागत रूप से संतुलित माने जाने वाले यूरोपीय देशों द्वारा इस बार स्पष्ट पक्ष लेना इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता रही, वहीं प्रधानमंत्री ने भारत और नॉर्डिक देशों के संबंधों को केवल सरकारी स्तर तक सीमित न बताते हुए इन्हें नवाचार, अनुसंधान और जन-विश्वास पर आधारित व्यापक साझेदारी के रूप में परिभाषित किया।
ग्रीन टेक्नोलॉजी इस साझेदारी का प्रमुख आधार बनकर उभरी है, जिसमें नॉर्वे और स्वीडन की हाइड्रोजन ऊर्जा में विशेषज्ञता, डेनमार्क की पवन ऊर्जा क्षमता और फिनलैंड की सर्कुलर अर्थव्यवस्था की भूमिका अहम रही, जबकि भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य साझा करते हुए तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनाई।
इस दौरान स्वीडन की कंपनियों द्वारा भारत में ग्रीन स्टील परियोजनाओं पर कार्य और डेनमार्क के साथ अपतटीय पवन ऊर्जा सहयोग जैसे समझौते भी हुए, जिन्हें भारत के ऊर्जा परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी सहयोग को नई दिशा दी गई, जिसमें फिनलैंड की 6जी तकनीक क्षमता और भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर तथा यूपीआई मॉडल को मिलाकर डिजिटल कॉरिडोर विकसित करने पर सहमति बनी, साथ ही नॉर्वे के साथ ब्लू इकोनॉमी, डीप-सी माइनिंग और आर्कटिक अनुसंधान में सहयोग को भी विस्तार मिला।
भारत की आर्कटिक काउंसिल में पर्यवेक्षक भूमिका और नॉर्डिक देशों की स्थायी सदस्यता के चलते यह सहयोग ध्रुवीय क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत कर सकता है, वहीं व्यापारिक दृष्टि से नॉर्डिक देशों की 100 अरब डॉलर से अधिक की संयुक्त अर्थव्यवस्था के बावजूद भारत के साथ सीमित व्यापार को बढ़ाने पर जोर दिया गया।
यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ समझौते को शीघ्र लागू करने पर सहमति बनी, जिससे आइसलैंड की जियोथर्मल तकनीक, स्वीडन का रक्षा क्षेत्र और डेनमार्क की खाद्य प्रसंस्करण क्षमता भारत के लिए नए निवेश अवसर खोल सकती है।
यह सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर यूरोप में चिंता बनी हुई है, और भारत ने स्वयं को एक विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला भागीदार के रूप में प्रस्तुत करते हुए सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत ने अपने संतुलित रुख को दोहराते हुए कहा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, जबकि नॉर्डिक देशों ने भारत की भूमिका को “सेतु निर्माणकर्ता” के रूप में सराहा, जिससे भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति और मजबूत हुई है।
भारत ने स्पष्ट किया कि वह केवल बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और संतुलित साझेदारी का पक्षधर है, जहां तकनीक और निवेश के साथ-साथ डेटा संप्रभुता और “मेक इन इंडिया” की प्राथमिकताओं से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
नॉर्वे की धरती पर हुई यह बैठक भारत की नई कूटनीतिक सोच का प्रतीक मानी जा रही है, जहां आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख और तकनीकी सहयोग के विस्तार के साथ वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका और प्रभाव दोनों में वृद्धि के संकेत मिले हैं।






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