नई दिल्ली, 23 मई।
प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की जांच, कुर्की और दोषसिद्धि से जुड़े आंकड़ों ने पिछले दो दशकों में उसकी कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जहां 20 वर्षों में दर्ज 60 मामलों में अंतिम निर्णय आया और 56 मामलों में दोष सिद्ध हुआ, जिसे एजेंसी अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है, लेकिन इसी अवधि में कुर्क की गई लगभग 72 प्रतिशत संपत्ति अदालतों के आदेश पर वापस करनी पड़ी, जिससे उसकी कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठने लगे हैं।
ईडी ने पिछले 20 वर्षों में धन शोधन से जुड़े 511 मामले दर्ज किए, लेकिन इनमें से केवल सीमित मामलों में ही सुनवाई अंतिम चरण तक पहुंच सकी, जबकि करीब 99 प्रतिशत मामले अब भी लंबित हैं, वहीं 2005 से 2014 के बीच सिर्फ तीन गिरफ्तारियां दर्ज हुईं, जबकि 2014 के बाद के दशक में यह संख्या बढ़कर 272 तक पहुंच गई और इसी दौरान कुर्क संपत्ति का आंकड़ा भी 574.5 करोड़ से बढ़कर 11,938.63 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
आंकड़ों के अनुसार बीते दो दशकों में केवल 60 मामलों का ही अंतिम निपटारा हो सका, जिनमें 56 मामलों में दोष सिद्ध हुआ, जिसे ईडी अपनी सफलता दर के रूप में प्रस्तुत करती है, लेकिन बड़ी संख्या में लंबित मामलों के कारण यह दावा पूरी तस्वीर को नहीं दर्शाता, क्योंकि अधिकांश प्रकरण अब तक न्यायालयों में विचाराधीन हैं।
सबसे गंभीर प्रश्न कुर्क संपत्ति की वापसी से जुड़ा है, जहां अदालतों ने लगभग 72 प्रतिशत संपत्ति वापस करने के आदेश दिए, जिससे यह संकेत मिलता है कि कई मामलों में एजेंसी यह सिद्ध नहीं कर सकी कि संपत्ति अपराध से अर्जित थी, जबकि कानून के अनुसार अस्थायी कुर्की के बाद तय समय में प्रमाण देना आवश्यक होता है, अन्यथा कुर्की रद्द कर दी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार कई मामलों में कार्रवाई समय से पहले की जाती है और चार्जशीट से पहले ही संपत्ति जब्त कर ली जाती है, जिसके बाद अदालतों में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत न होने पर कुर्की रद्द हो जाती है, जिससे एजेंसी की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।
एक अन्य प्रमुख कारण जांच में तकनीकी विशेषज्ञता और संसाधनों की कमी माना जाता है, क्योंकि धन शोधन जैसे मामलों में जटिल वित्तीय लेनदेन, शेल कंपनियों और डिजिटल ट्रांजेक्शन की गहन जांच की आवश्यकता होती है, लेकिन सीमित मानव संसाधन के कारण कई जांचें अधूरी रह जाती हैं।
इसके अलावा 2014 के बाद एजेंसी की कार्रवाई में आई तेज वृद्धि को लेकर राजनीतिक दखल के आरोप भी लगातार उठते रहे हैं, जहां विपक्ष का दावा है कि जांच एजेंसी का उपयोग राजनीतिक दबाव के रूप में किया जा रहा है, विशेषकर चुनावों से पहले छापों और गिरफ्तारियों के मामलों में यह बहस और तेज हो जाती है।
गिरफ्तारी के आंकड़े भी इस बहस को और मजबूत करते हैं, क्योंकि गिरफ्तारी का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं होता और कई मामलों में आरोपी लंबे समय तक जेल में रहते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह टिप्पणी कर चुका है कि जेल अपवाद होना चाहिए, नियम नहीं, इसके बावजूद जमानत प्रक्रिया कई मामलों में कठिन बनी रहती है।
हालांकि यह भी स्वीकार किया जाता है कि ईडी देश की आर्थिक सुरक्षा और वित्तीय अपराधों पर नियंत्रण के लिए एक महत्वपूर्ण संस्था है, लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि जांच क्षमता, तकनीकी विशेषज्ञता और पारदर्शिता को और मजबूत किया जाए, ताकि अदालतों में इसकी कार्रवाई अधिक ठोस आधार पर टिक सके।
कुल मिलाकर कुर्क संपत्ति का बड़ा हिस्सा वापस किया जाना केवल आंकड़ा नहीं बल्कि पूरी जांच प्रणाली पर प्रश्नचिह्न है, जो यह दर्शाता है कि केवल कार्रवाई नहीं बल्कि निष्पक्ष और ठोस जांच ही न्यायिक प्रक्रिया में टिकाऊ साबित हो सकती है।






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