नई दिल्ली, 23 मई।
क्रीमी लेयर को लेकर एक बार फिर देश में तीव्र बहस शुरू हो गई है, जहां सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी कि यदि किसी परिवार के दोनों माता-पिता आईएएस अधिकारी हैं तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए, ने पूरे आरक्षण ढांचे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं और यह मुद्दा केवल एक मामले तक सीमित न रहकर उस व्यापक चिंता को सामने ला रहा है जिसमें लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि आरक्षण का लाभ कहीं सीमित और सक्षम वर्ग तक तो नहीं सिमटता जा रहा है।
भारत में क्रीमी लेयर की अवधारणा को वर्ष 1992 के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी मामले में संवैधानिक मान्यता मिली थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया था कि आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत हो चुके लोगों को इस व्यवस्था से बाहर रखा जाना चाहिए ताकि वास्तविक रूप से वंचित वर्गों तक इसका लाभ पहुंच सके, जिसके बाद 1993 में सरकार ने आय सीमा 1 लाख रुपये तय की थी जो समय के साथ बढ़कर वर्तमान में 8 लाख रुपये वार्षिक हो चुकी है।
हालांकि वर्तमान बहस केवल आय सीमा तक सीमित नहीं रह गई है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में यह भी कहा है कि क्रीमी लेयर केवल आर्थिक स्थिति का नहीं बल्कि सामाजिक स्तर का भी मूल्यांकन है, जिसमें यह देखा जाना चाहिए कि क्या कोई परिवार प्रशासनिक या उच्च सरकारी पदों तक पहुंच चुका है, क्योंकि ऐसे परिवारों को सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत अधिक सशक्त माना जाता है और यदि आरक्षण का लाभ बार-बार ऐसे वर्गों तक ही सीमित रहता है तो दूरस्थ और अत्यंत पिछड़े समुदायों तक अवसर नहीं पहुंच पाते।
विभिन्न रिपोर्टों और अध्ययनों में भी यह संकेत मिलता है कि आरक्षण का अधिकांश लाभ शहरी और अपेक्षाकृत विकसित वर्गों तक सीमित हो गया है, जहां राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग सहित कई सामाजिक शोधों ने यह निष्कर्ष दिया है कि अत्यंत पिछड़े समुदाय शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अपेक्षित प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर पाए हैं, जिसके कारण समय-समय पर उप-श्रेणीकरण और आंतरिक आरक्षण की मांग भी उठती रही है।
दूसरी ओर आरक्षण समर्थक यह तर्क देते हैं कि सामाजिक भेदभाव केवल आर्थिक उन्नति से समाप्त नहीं होता और एक ही वर्ग का व्यक्ति उच्च पद पर पहुंचने के बावजूद सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना कर सकता है, इसलिए केवल आय या पद के आधार पर आरक्षण समाप्त करना जमीनी वास्तविकताओं की अनदेखी होगी, इसी कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में क्रीमी लेयर लागू करने का मुद्दा आज भी अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है।
इसके बावजूद यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि क्या आरक्षण का वास्तविक लाभ सबसे जरूरतमंद तक पहुंच पा रहा है, जहां सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है और यह बहस केवल कानूनी दायरे तक सीमित न रहकर सामाजिक न्याय की विश्वसनीयता से भी जुड़ गई है, क्योंकि किसी भी व्यवस्था की सार्थकता तभी मानी जाएगी जब उसका लाभ समाज के सबसे निचले स्तर तक प्रभावी रूप से पहुंचे।





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