संपादकीय
19 May, 2026

ईरान अब भी मजबूत, अमेरिका के दावों पर उठते सवाल

मध्य पूर्व में युद्धविराम के बाद ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर अमेरिका के दावों और खुफिया रिपोर्टों के बीच सामने आए विरोधाभास ने वैश्विक रणनीतिक हालात पर नई बहस खड़ी कर दी है, जिसमें उसकी मिसाइल क्षमता, होरमुज जलडमरूमध्य की स्थिति और क्षेत्रीय तनाव को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

19 मई।

मध्य पूर्व में युद्धविराम लागू हुए अभी मुश्किल से एक महीना बीता है, लेकिन ईरान को लेकर अमेरिकी दावों और खुफिया रिपोर्टों के बीच बड़ा विरोधाभास सामने आने लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ लगातार यह दावा करते रहे कि संयुक्त अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान ने ईरान की सैन्य क्षमता को लगभग समाप्त कर दिया है। दूसरी ओर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की ताजा रिपोर्टें संकेत दे रही हैं कि ईरान अब भी पर्याप्त सैन्य ताकत बचाए हुए है और उसकी मिसाइल क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
यही कारण है कि अब अमेरिका के भीतर ही यह बहस तेज हो गई है कि क्या व्हाइट हाउस ने युद्ध के परिणामों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। कई विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने सैन्य सफलता का राजनीतिक लाभ लेने के लिए ईरान की वास्तविक स्थिति को जरूरत से ज्यादा कमजोर बताने की कोशिश की।
अमेरिकी सैन्य अभियान के दौरान ईरान के कई सामरिक ठिकानों, मिसाइल अड्डों और रक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इजरायल और अमेरिका ने मिलकर फरवरी के अंत में जिस संयुक्त अभियान की शुरुआत की थी, उसका उद्देश्य ईरान की मिसाइल और रक्षा क्षमता को लंबे समय तक कमजोर करना बताया गया। लेकिन खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, होरमुज जलडमरूमध्य के आसपास मौजूद ईरान के अधिकांश मिसाइल ठिकाने अब भी सक्रिय हैं। यह वही इलाका है जहां से दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल कारोबार गुजरता है।
होरमुज जलडमरूमध्य केवल ईरान या मध्य पूर्व का मुद्दा नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र माना जाता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो दुनिया भर में तेल कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि अमेरिकी नौसेना लगातार इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए हुए है। अमेरिकी युद्धपोतों की तैनाती बढ़ाई गई है और समुद्री निगरानी भी तेज कर दी गई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ईरान की सैन्य क्षमता वास्तव में खत्म हो चुकी थी, तो फिर अमेरिका को इतनी बड़ी सैन्य उपस्थिति बनाए रखने की जरूरत क्यों पड़ रही है। यही विरोधाभास अब ट्रंप प्रशासन के दावों पर सवाल खड़े कर रहा है।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान के कई भूमिगत मिसाइल केंद्र पूरी तरह नष्ट नहीं किए जा सके। अमेरिकी सेना के पास सीमित संख्या में बंकर भेदी हथियार थे, इसलिए कई स्थानों पर पूरे ठिकाने को तबाह करने के बजाय उनके प्रवेश मार्ग बंद करने की रणनीति अपनाई गई। लेकिन इस रणनीति के मिश्रित परिणाम सामने आए। कई ठिकानों को अस्थायी नुकसान हुआ, मगर वे पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुए।
युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारी मात्रा में आधुनिक मिसाइलों और रक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल किया। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने करीब 1100 लंबी दूरी की स्टील्थ क्रूज मिसाइलें दागीं। इसके अलावा 1000 से अधिक टॉमहॉक मिसाइलों का उपयोग किया गया। पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर हुआ। यह संख्या इतनी अधिक है कि अब अमेरिकी हथियार भंडार पर दबाव बढ़ने लगा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन हथियारों की भरपाई कुछ महीनों में संभव नहीं है। अमेरिका की रक्षा कंपनियां पहले से ही उत्पादन क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन आधुनिक मिसाइल प्रणालियों का निर्माण आसान प्रक्रिया नहीं है। लॉकहीड मार्टिन जैसी कंपनियां पैट्रियट इंटरसेप्टर का उत्पादन बढ़ाने की योजना बना रही हैं, फिर भी मौजूदा खपत की तुलना में उत्पादन बेहद कम माना जा रहा है।
यही कारण है कि यूरोपीय देशों में भी चिंता बढ़ रही है। यूक्रेन युद्ध के दौरान यूरोपीय देशों ने अमेरिका से बड़ी मात्रा में हथियार खरीदे थे। अब उन्हें आशंका है कि यदि अमेरिका अपने भंडार को भरने में जुटा रहा, तो यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यदि ईरान के साथ संघर्ष दोबारा तेज होता है, तो यह संकट और गहरा सकता है।
अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर मतभेद दिखाई देने लगे हैं। ट्रंप के कई समर्थक शुरू से ही ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान के विरोध में थे। उनका मानना था कि अमेरिका को एक और लंबे विदेशी संघर्ष में नहीं उलझना चाहिए। अब जब खुफिया रिपोर्टें ईरान की बची हुई सैन्य क्षमता की ओर इशारा कर रही हैं, तब इन आलोचनाओं को और बल मिल रहा है।
दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन लगातार यही संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिका ने अपने सभी सैन्य उद्देश्य हासिल कर लिए हैं। व्हाइट हाउस का कहना है कि ईरान की मौजूदा स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है और उसकी सैन्य ताकत को गंभीर नुकसान पहुंचा है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि ईरान अब भी होरमुज क्षेत्र में प्रभावी क्षमता बनाए हुए है, तो युद्ध को पूरी सफलता बताना जल्दबाजी होगी।
ईरान की स्थिति भी विरोधाभासी दिखाई देती है। एक तरफ उसके कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी मारे गए हैं, अर्थव्यवस्था दबाव में है और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर लगातार बढ़ रहा है। दूसरी तरफ वह अब भी क्षेत्रीय दबाव बनाए रखने की स्थिति में दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि मध्य पूर्व में स्थायी शांति की संभावना अभी भी कमजोर मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्धविराम टूटता है और अमेरिका दोबारा बड़े हमले करता है, तो उसे अपने हथियार भंडार में और गहराई तक जाना पड़ेगा। इससे अमेरिका की एशिया रणनीति पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि चीन और उत्तर कोरिया को लेकर अमेरिकी सैन्य योजनाओं के लिए भी यही हथियार जरूरी माने जाते हैं।
पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का सवाल नहीं रह गया है। अब यह आर्थिक क्षमता, हथियार उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक रणनीतिक संतुलन का भी संघर्ष बन चुका है। ईरान के खिलाफ अभियान ने भले ही अमेरिका को तत्काल सामरिक बढ़त दी हो, लेकिन ताजा खुफिया रिपोर्टें संकेत दे रही हैं कि यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। मध्य पूर्व में तनाव का यह दौर आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित कर सकता है।
 
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