रसायनयुक्त फलों के बढ़ते उपयोग से लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है, वहीं खाद्य विभाग की लापरवाही और कमजोर निगरानी व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
19 मई।
स्वस्थ रहने के लिए लोग फल खाते हैं। डॉक्टर भी रोज एक सेब खाने की सलाह देते हैं। लेकिन अगर यही फल जहर बनकर आपकी थाली में पहुंचे तो? भोपाल सहित कई शहरों में सड़क किनारे बिकने वाले आम, तरबूज, केले और अंगूर को कृत्रिम तरीके से पकाकर और चमकाकर बेचा जा रहा है। ये फल सेहत नहीं, अस्पताल का रास्ता दिखा रहे हैं।
खबर है कि भोपाल में सड़क किनारे बिकने वाले मैंगो जूस और फलों को खाने-पीने से कई लोग बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि फलों में कैल्शियम कार्बाइड, एथिलीन, रोडामाइन-बी जैसे खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है। ये रसायन फलों को तेजी से पकाते हैं, रंग चमकाते हैं, लेकिन शरीर में जाकर लीवर, किडनी, पेट और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं। सवाल यह है कि जब हर गली-चौराहे पर जहर बिक रहा है, तो खाद्य विभाग कहां है? और सबसे बड़ा सवाल, फलों में जहर न मिलने देने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
बाजार में फल जल्दी पकाने और आकर्षक दिखाने के लिए तीन तरह के रसायनों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। कैल्शियम कार्बाइड आम और केले को जल्दी पकाने के लिए डाला जाता है। यह एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जो आर्सेनिक और फॉस्फोरस से दूषित होती है। इससे पेट दर्द, उल्टी, सिरदर्द और लंबे समय में कैंसर तक हो सकता है। एथिलीन प्राकृतिक हार्मोन है, लेकिन औद्योगिक स्तर पर इसका दुरुपयोग हो रहा है। इससे फल ऊपर से पक जाते हैं और अंदर कच्चे रह जाते हैं।
रोडामाइन-बी और मेलाकाइट ग्रीन तरबूज और अंगूर को लाल और चमकीला दिखाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। ये रंग कैंसरकारक माने जाते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे फलों को खाने से पेट, लीवर, हार्ट और किडनी पर सीधा असर पड़ता है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह और खतरनाक है।
समस्या नई नहीं है। हर साल गर्मियों में अखबारों में खबरें आती हैं कि बाजार में रसायनयुक्त फल बिक रहे हैं। छापेमारी होती है, कुछ किलो फल जब्त होते हैं, फोटो खिंचती है और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। भोपाल में भी सड़क किनारे खुले में फल काटकर जूस बेचा जा रहा है। धूल, मक्खी और गंदगी के बीच तैयार जूस में ऊपर से रसायनयुक्त फल मिल जाते हैं। नतीजा, लोग अस्पताल पहुंच रहे हैं।
खाद्य विभाग का काम है नियमित जांच, सैंपलिंग और दोषियों पर कार्रवाई। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि विभाग के पास न पर्याप्त स्टाफ है, न जांच के संसाधन। और जहां जांच होती भी है, वहां जुर्माना इतना कम है कि व्यापारी उसे “धंधे का खर्च” मानकर फिर से वही काम शुरू कर देते हैं।
यह सिर्फ खाद्य विभाग की नाकामी नहीं है। यह एक सामूहिक विफलता है। प्रशासन और खाद्य विभाग के लिए एफएसएसएआई कानून के तहत रसायनयुक्त फल बेचना अपराध है, लेकिन प्रवर्तन कमजोर है। नियमित छापेमारी, मोबाइल टेस्टिंग लैब और त्वरित कार्रवाई का अभाव है। सड़क किनारे लगने वाले ठेलों पर तो कोई जांच ही नहीं होती।
किसान और छोटे व्यापारी अक्सर कहते हैं कि मंडी में ही ऐसे फल आते हैं। बड़े व्यापारियों को जल्दी मुनाफा चाहिए, इसलिए वे रसायनों का इस्तेमाल करते हैं। मंडी समिति की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे फलों की एंट्री रोके, लेकिन वहां भी भ्रष्टाचार और लापरवाही है।
हम सस्ते और चमकीले फल देखकर खरीद लेते हैं। असली देसी फल, जिसका रंग फीका हो, उसे कोई नहीं पूछता। जब तक उपभोक्ता जागरूक नहीं होगा, तब तक यह धंधा चलता रहेगा। किसानों को सुरक्षित पकाने की तकनीक, कोल्ड स्टोरेज और बाजार तक पहुंच नहीं मिलती, इसलिए वे जल्दी पैसा कमाने के लिए रसायनों का सहारा लेते हैं। सरकार को सस्ती और सुरक्षित तकनीक उपलब्ध करानी होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार कुछ संकेतों से रसायनयुक्त फल पहचाने जा सकते हैं। फल असामान्य रूप से चमकीला और एक जैसा पका हुआ लगे, तरबूज के अंदर बहुत गहरा लाल रंग हो लेकिन स्वाद फीका हो, आम या केले को छीलने पर अंदर से कच्चा निकले, फल से अजीब सी गंध आए या काटने पर जलन हो, कटे हुए फल लंबे समय तक खराब न हों, तो समझना चाहिए कि उनमें रसायन मिला है।
रसायनयुक्त फल खाने से तत्काल उल्टी, दस्त और पेट दर्द होता है, लेकिन लंबे समय में यह लीवर सिरोसिस, किडनी फेल्योर, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर और कैंसर का कारण बन सकता है। बच्चों में यह विकास में बाधा, सीखने की क्षमता में कमी और व्यवहार संबंधी समस्याएं पैदा करता है। यानी हम अपने बच्चों को स्वास्थ्य के नाम पर धीमा जहर खिला रहे हैं।
एफएसएसएआई एक्ट के तहत दोषियों पर जुर्माने के साथ जेल की सजा होनी चाहिए। छोटे जुर्माने से कुछ नहीं बदलेगा। हर जिले में मोबाइल टेस्टिंग लैब हो, जो सड़क किनारे ही सैंपल जांच सके। स्कूल, कॉलेज और मीडिया के जरिए लोगों को बताया जाए कि रसायनयुक्त फल कैसे पहचानें। किसानों को इथिलीन चैंबर, कोल्ड स्टोरेज और जैविक पकाने की विधियां सस्ती दर पर उपलब्ध कराई जाएं।
जब तक हम चमकीले फल खरीदना बंद नहीं करेंगे, तब तक व्यापारी रसायनों का इस्तेमाल बंद नहीं करेंगे। सेहत से बड़ा कोई व्यापार नहीं। फल प्रकृति का वरदान हैं, लेकिन लालच के कारण हमने इन्हें जहर बना दिया है। सबसे दुखद बात यह है कि हम खुद अपनी जेब से पैसे देकर यह जहर खरीद रहे हैं।
खाद्य विभाग को अब कुंभकर्णी नींद छोड़नी होगी। अगर आज कार्रवाई नहीं हुई तो कल यही रसायन कैंसर वार्ड की बेड बढ़ाएंगे। जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है। किसान, व्यापारी, उपभोक्ता और मीडिया सभी को मिलकर यह तय करना होगा कि हम अपनी थाली में पोषण रखेंगे, जहर नहीं। वरना वह दिन दूर नहीं जब लोग कहेंगे — “फल मत खाओ, जहर है।” और यह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात होगी।