संपादकीय
19 May, 2026

खरीदी में भ्रष्टाचार पर लगाम, 20 करोड़ से अधिक की खरीद पर मुख्य सचिव समिति की सख्त निगरानी

मध्य प्रदेश सरकार ने 20 करोड़ से अधिक की सरकारी खरीद पर मुख्य सचिव समिति की निगरानी अनिवार्य कर दी है, जिससे टेंडर विभाजन रोककर पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित किया जाएगा।

19 मई।

मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में वर्षों से चल रहे विभाजन और बंटवारे के जरिए नियमों से बचने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए बड़ा कदम उठाया है, जिसके तहत अब 20 करोड़ रुपये से अधिक की किसी भी खरीद को मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति की मंजूरी के बिना आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा।

सरकारी तंत्र में लंबे समय से यह देखा जाता रहा है कि बड़ी खरीद को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर विभागीय स्तर पर ही निपटाया जाता था, जिससे उच्च स्तरीय मंजूरी से बचा जा सके और पारदर्शिता प्रभावित होती रही, विशेषकर आईटी उपकरणों और महंगे संसाधनों की खरीद में यह प्रवृत्ति अधिक देखने को मिलती थी।

नई व्यवस्था के तहत वित्त विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब 20 करोड़ रुपये से अधिक की सभी खरीद सीधे मुख्य सचिव समिति के पास जाएगी, जहां खरीद की आवश्यकता, दरों और पूरी प्रक्रिया की विस्तृत जांच के बाद ही अंतिम अनुमति प्रदान की जाएगी।

सरकार ने यह भी साफ किया है कि किसी भी खरीद को कृत्रिम रूप से विभाजित कर नियमों को दरकिनार करने की अनुमति नहीं होगी और सभी प्रक्रियाएं तय मानकों के अनुसार ही संचालित होंगी।

समिति में वरिष्ठ सचिव स्तर के अधिकारी शामिल होंगे और खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए जेम पोर्टल तथा ई-टेंडरिंग प्रणाली को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है, जिससे डिजिटल माध्यम से निगरानी मजबूत हो सके।

इससे पहले भी ई-टेंडरिंग और केंद्रीकृत खरीद प्रणाली जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई थीं, जिनका सीमित प्रभाव छोटे स्तर की खरीद पर दिखा, लेकिन बड़े प्रोजेक्ट्स में अनियमितताओं की शिकायतें बनी रहीं, जिसका प्रमुख कारण निगरानी की कमी माना जाता है।

यदि नया नियम प्रभावी ढंग से लागू हुआ तो बड़ी खरीद में विभाजन की प्रवृत्ति पर रोक लगने के साथ ही उच्च स्तरीय निगरानी सुनिश्चित होगी और सरकारी धन के दुरुपयोग पर अंकुश लग सकता है, जिससे संभावित रूप से भारी वित्तीय बचत भी हो सकती है।

हालांकि इसके साथ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं, क्योंकि समिति पर कार्यभार बढ़ने से मंजूरी प्रक्रिया धीमी होने की आशंका है, जिससे विकास कार्यों और आवश्यक खरीद पर प्रभाव पड़ सकता है और विभागीय स्तर पर असंतोष भी बढ़ सकता है।

पूर्व में स्वास्थ्य, शिक्षा और पंचायत विभागों की खरीद से जुड़े मामलों में अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं, लेकिन कई मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं होने से व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठते रहे हैं।

सरकारी खरीद पर हर वर्ष भारी बजट खर्च होता है, जो सीधे जनसुविधाओं से जुड़ा होता है, ऐसे में यदि यह धन पारदर्शी तरीके से उपयोग नहीं होता तो इसका प्रभाव आम जनता पर पड़ता है, इसलिए यह नया निर्णय व्यवस्था सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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