19 मई।
राजनीति में शब्दों का महत्व सिर्फ कहे जाने में नहीं, बल्कि समय और संदर्भ में भी होता है। इंदौर की रेसीडेंसी कोठी में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और भाजपा विधायक उषा ठाकुर की मुलाकात के दौरान दिया गया बयान अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
दिग्विजय सिंह ने बातचीत के दौरान कहा, “मैं घोषणा करता आया हूं और आज फिर कह रहा हूं कि मैं घोर सनातन धर्म का मानने वाला हूं।” उन्होंने यह भी कहा कि “पहले आप लोग सिर्फ हिंदू धर्म की बात करते थे, मेरे कहने के बाद ही आपने सनातन शब्द स्वीकार किया।”
वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठने लगे कि एक कांग्रेस नेता को अचानक खुद को “घोर सनातनी” कहने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या यह व्यक्तिगत आस्था की अभिव्यक्ति है या बदलते राजनीतिक माहौल के अनुसार नई रणनीति।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस पर “हिंदू विरोधी” होने का नैरेटिव लगातार मजबूत हुआ है। राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और सनातन धर्म जैसे मुद्दों पर भाजपा ने कांग्रेस को अक्सर रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया। ऐसे माहौल में दिग्विजय सिंह का यह बयान उस धारणा को तोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
पूरी बातचीत का लहजा टकरावपूर्ण नहीं, बल्कि सौहार्दपूर्ण था। उषा ठाकुर ने उन्हें “बड़े भाई” कहा, जबकि दिग्विजय सिंह ने नर्मदा यात्रा और धार्मिक आस्था का उल्लेख किया। लेकिन इसी संवाद में राजनीतिक संदेश भी छिपा था।
भाजपा लंबे समय से “सनातन” शब्द को अपने वैचारिक ब्रांड के रूप में स्थापित करती रही है। अब कांग्रेस भी उसी शब्दावली में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
दिग्विजय सिंह का “मैं घोर सनातनी हूं” कहना सिर्फ निजी आस्था का बयान नहीं, बल्कि बदलती राजनीतिक भाषा का संकेत भी माना जा रहा है।