नई दिल्ली, 15 मई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अपनी पांच देशों की विदेश यात्रा की शुरुआत अबू धाबी से की है। यह दौरा 15 से 20 मई तक संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली को शामिल करेगा, जिसका उद्देश्य भारत के रणनीतिक साझेदारियों को ऊर्जा, व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, नवाचार और हरित विकास के क्षेत्रों में और मजबूत करना है।
अबू धाबी में प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से होगी, जिसमें द्विपक्षीय सहयोग को और व्यापक बनाने तथा क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इस बातचीत में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, तकनीक, संस्कृति और जन-जन संपर्क जैसे विषयों को प्राथमिकता मिलने की संभावना है।
यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब दोनों देशों के बीच हाल के महीनों में कई उच्च स्तरीय आदान-प्रदान हुए हैं, जिनमें इस वर्ष जनवरी में यूएई राष्ट्रपति की भारत यात्रा और फरवरी में एआई शिखर सम्मेलन में अबू धाबी क्राउन प्रिंस की भागीदारी शामिल है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, ऊर्जा इस साझेदारी का एक प्रमुख स्तंभ बना हुआ है। पिछले वर्ष यूएई भारत का चौथा सबसे बड़ा कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता रहा, जिसने भारत की कुल जरूरत का लगभग 11 प्रतिशत पूरा किया। भारतीय कंपनियों ने अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के साथ लंबी अवधि के एलएनजी अनुबंध भी किए हैं, जिससे भारत की एलएनजी खरीद में यूएई की भूमिका और मजबूत हुई है।
यूएई भारत के एलपीजी आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा भी आपूर्ति करता है और पेट्रोलियम निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं और बिजली ग्रिड कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है। यूएई वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन का संस्थापक सदस्य भी है।
दोनों देशों की ऊर्जा साझेदारी अब पारंपरिक कच्चे तेल व्यापार से आगे बढ़कर प्राकृतिक गैस, हरित ऊर्जा और परमाणु सहयोग तक पहुंच गई है। हाल ही में एक दशक लंबी एलएनजी आपूर्ति समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए हैं, जिससे दीर्घकालिक मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।
नवीकरणीय ऊर्जा और नागरिक परमाणु क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ रहा है, जहां यूएई के निवेश भारत के सौर क्षेत्र में सक्रिय हैं और भारत के नए परमाणु कानून से छोटे रिएक्टरों जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं खुली हैं। दोनों देश रुपये और दिरहम में ऊर्जा व्यापार को बढ़ावा देकर डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं।















