19 मई।
मध्य प्रदेश की बिजली व्यवस्था फिर सवालों के घेरे में है। वजह है एक पावर प्लांट की खरीद और उससे मिलने वाली बिजली की कीमत। सरकार ने 2024 में दिवालिया हो चुके कोरबा स्थित एक पावर प्लांट को बैंकों से 4,101 करोड़ रुपये में खरीदा, लेकिन अब वही बिजली आम उपभोक्ताओं को महंगे दामों पर मिल रही है। सवाल यह है कि सरकार ने 72 प्रतिशत छूट पर प्लांट खरीदा, तो बिजली सस्ती क्यों नहीं हुई? क्या यह डील जनता के हित में है या फिर एक बार फिर उद्योगपतियों को फायदा और आम आदमी को नुकसान?
सितंबर 2024 में मध्य प्रदेश सरकार ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद अदाणी पावर के कोरबा प्लांट को खरीदा। प्लांट पर बैंकों का 14,631 करोड़ रुपये का कर्ज था, लेकिन सरकार ने सिर्फ 4,101 करोड़ रुपये में डील फाइनल कर ली। यानी करीब 72 प्रतिशत की छूट। सरकार का तर्क था कि इससे प्रदेश को सस्ती बिजली मिलेगी और बिजली कंपनियों का घाटा कम होगा। लेकिन हकीकत इसके उलट है। बिजली नियामक आयोग ने साफ कहा है कि इस खरीद का बोझ अब उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा। यानी जनता को बिजली महंगी मिलेगी। सवाल यह है कि सस्ते में खरीदो और महंगे में बेचो का यह कौन सा गणित है?
यह वही पुराना खेल है, जो हर बार दोहराया जाता है। पहले उद्योगपति घाटे में जाता है और बैंकों का पैसा डूबता है। फिर सरकार “बचाने” के नाम पर वही प्लांट औने-पौने दामों में खरीद लेती है। इसके बाद उसी प्लांट से बनने वाली बिजली जनता को महंगे दामों पर बेची जाती है। इस मामले में भी यही हुआ। बैंकों का 14,631 करोड़ रुपये का कर्ज सिर्फ 4,101 करोड़ रुपये में निपटा दिया गया। बैंकों को भारी नुकसान हुआ और अब बिजली की कीमत बढ़ाकर उसकी भरपाई आम उपभोक्ताओं से की जाएगी।
सरकारों की नीति हमेशा दोहरी रही है। एक तरफ उद्योगपतियों को राहत, दूसरी तरफ आम आदमी पर बोझ। कर्ज माफ, टैक्स में छूट और दिवालिया होने पर भी संपत्ति बचाने की व्यवस्था उद्योगपतियों के लिए तैयार रहती है, जबकि बिजली, पानी, पेट्रोल और डीजल जैसी जरूरी चीजें लगातार महंगी होती जाती हैं। हर बार यही कहा जाता है कि “जनता को बोझ उठाना होगा।”
इस स्थिति के लिए सिर्फ एक सरकार जिम्मेदार नहीं है। वर्षों से बिजली खरीद के समझौते ऐसे बनाए जाते रहे हैं, जिनमें निजी कंपनियों को फायदा सुनिश्चित होता है। पावर परचेज एग्रीमेंट की कई शर्तें ऐसी हैं कि चाहे बिजली का उपयोग हो या नहीं, कंपनियों को भुगतान मिलता रहता है। बिजली दरें तय करने वाला नियामक आयोग भी अक्सर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने में कमजोर दिखाई देता है।
मध्य प्रदेश के उपभोक्ता पहले से ही महंगी बिजली और कटौती से परेशान हैं। किसान, छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग लगातार बढ़ते बिलों का दबाव झेल रहे हैं। अब इस डील के बाद नया बोझ भी जनता पर डालने की तैयारी है। सवाल यह है कि जब प्लांट सस्ते में खरीदा गया, तो उसका लाभ उपभोक्ताओं को क्यों नहीं मिला?
जरूरत इस बात की है कि बिजली खरीद के सभी समझौते सार्वजनिक किए जाएं और उपभोक्ताओं की आवाज को भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाए जितनी कंपनियों की मांगों को सुना जाता है। अगर किसी डील से जनता को नुकसान हो रहा है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वरना “विकास” के नाम पर जनता से वसूली और उद्योगपतियों को राहत देने का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।