संपादकीय
08 Jun, 2026

शांतिदूत या युद्धदूत? ट्रम्प की आक्रामक विदेश नीति से एशिया से अफ्रीका तक फैली अशांति

डोनाल्ड ट्रम्प की सैन्य आक्रामकता ने वैश्विक ऊर्जा संकट और अस्थिरता को जन्म दिया है, जिससे भारत सहित पूरा ग्लोबल साउथ गहरे रणनीतिक और आर्थिक दबाव में है।

वाशिंगटन, 08 जून।

ट्रम्प की विदेश नीति पर वैश्विक सवाल

दूसरी पारी में डोनाल्ड ट्रम्प ने 15 देशों को धमकी दी और 7 देशों में सैन्य कार्रवाई की। ईरान युद्ध से ऊर्जा संकट गहराया और दुनिया की 20 प्रतिशत तेल-गैस आपूर्ति प्रभावित हुई।

1 फरवरी 2025 को डोनाल्ड ट्रम्प ने दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने स्वयं को ‘शांतिदूत’ घोषित करते हुए दुनिया से युद्ध समाप्त करने का वादा किया था। लेकिन 16 महीने बाद तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है। दुनिया को शांतिदूत चाहिए, युद्धदूत नहीं। यदि एशिया से अफ्रीका तक बारूद की गंध फैली रही तो ‘अमेरिका ग्रेट अगेन’ का सपना ‘अमेरिका आइसोलेटेड’ में बदल सकता है और इसकी सबसे बड़ी कीमत वह ग्लोबल साउथ चुकाएगा जिसने न युद्ध चाहा और न ही युद्ध छेड़ा। ट्रम्प प्रशासन को समझना होगा कि बंदूक की नोक पर शांति नहीं लिखी जाती, बल्कि संवाद की मेज पर लिखी जाती है।

अमेरिकी सेना तीन महाद्वीपों के सात देशों—सीरिया, इराक, ईरान, यमन, सोमालिया, नाइजीरिया और वेनेजुएला—में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई कर चुकी है, जबकि 15 देशों को खुली धमकियां दी जा चुकी हैं। क्यूबा और ग्रीनलैंड तक निशाने पर हैं। ईरान युद्ध ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अस्थिर कर दिया है, जिससे दुनिया की 20 प्रतिशत तेल-गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा अब ‘अमेरिका अलोन’ में बदलता दिखाई दे रहा है।

ट्रम्प प्रशासन की सैन्य टाइमलाइन पर नजर डालें तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है। फरवरी 2025 में सोमालिया में अल-शबाब और आईएसआईएस के खिलाफ एयरस्ट्राइक, मार्च 2025 में इराक में आईएस के ठिकानों पर हमला और यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ लगातार तीन महीने तक कार्रवाई हुई। दिसंबर 2025 में सीरिया और नाइजीरिया में आईएस के विरुद्ध अभियान चलाया गया। सबसे बड़ा मोर्चा ईरान में खुला, जहां जून 2025 से फरवरी 2026 तक परमाणु ठिकानों पर हमले और सत्ता परिवर्तन की खुली कोशिशें की गईं। जनवरी 2026 में वेनेजुएला में तेल पर वर्चस्व के लिए हस्तक्षेप किया गया।

राष्ट्रपति ट्रम्प इसे आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध बताते हैं, जबकि आलोचक इसे संसाधनों की लड़ाई और घरेलू राजनीति का विदेशी विस्तार मानते हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का दावा है कि फरवरी 2026 में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई पर हुए हमले के समय वे वहीं मौजूद थे। खामेनेई बाल-बाल बच गए, लेकिन इसके बाद टकराव व्यक्तिगत स्वरूप ले चुका है।

पश्चिम एशिया ट्रम्प की नीति का केंद्र बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है। यह 90 प्रतिशत संवर्धन से केवल एक कदम दूर है और लगभग 10 परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता है। ट्रम्प प्रशासन का आरोप है कि ईरान ‘ब्रेकआउट टाइम’ को लगभग शून्य पर ले आया है। जून 2025 से शुरू हुए हवाई हमलों में नतांज, फोर्डो और इस्फहान के परमाणु केंद्र निशाना बने, लेकिन इसकी कीमत पूरी दुनिया चुका रही है।

होर्मुज जलडमरूमध्य से प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। युद्ध की आशंका के कारण ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है। भारत जैसे आयातक देशों में पेट्रोल-डीजल लगभग 15 प्रतिशत महंगा हुआ है। खाद, परिवहन और महंगाई सहित हर क्षेत्र पर इसका दबाव दिखाई दे रहा है। शांतिदूत के युद्ध ने ग्लोबल साउथ की कमर तोड़ दी है।

अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिका तक आतंकवाद के नाम पर प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की रणनीति भी दिखाई देती है। नाइजीरिया में दिसंबर 2025 की कार्रवाई को आईएसआईएस के खिलाफ बताया गया, लेकिन आलोचकों के अनुसार असली लक्ष्य बोको हराम के बहाने गल्फ ऑफ गिनी के तेल भंडार थे। सोमालिया में 2006 के बाद सबसे बड़ा अमेरिकी जमीनी अभियान चल रहा है। जनवरी 2026 में वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन की कोशिश को मादुरो सरकार ने तेल पर कब्जे की साजिश बताया। लैटिन अमेरिका में यह 1904 की रूजवेल्ट कॉरोलरी की वापसी जैसा प्रतीत होता है, जिसमें ‘अमेरिका का पिछवाड़ा, अमेरिका का अधिकार’ की सोच झलकती है।

ट्रम्प की आक्रामकता के तीन प्रमुख कारण दिखाई देते हैं। पहला, घरेलू राजनीति। 2024 के चुनाव में बॉर्डर सिक्योरिटी और इस्लामिक आतंकवाद प्रमुख मुद्दे थे। विदेशों में कार्रवाई से अपने कोर वोटर को यह संदेश दिया गया कि वादा निभाया गया। दूसरा, चीन की घेराबंदी। ईरान पर हमले से चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना और उसकी ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है। अफ्रीका में कार्रवाई भी ‘चाइना-प्लस-वन’ रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। तीसरा, हथियार उद्योग की भूमिका। 2025 में अमेरिकी रक्षा बजट 1 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया, जबकि लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन जैसी कंपनियों के शेयरों में लगभग 40 प्रतिशत उछाल दर्ज किया गया। युद्ध अर्थव्यवस्था का ईंधन बनता दिख रहा है।

भारत के सामने इस समय रणनीतिक धर्मसंकट है। अमेरिका उसका रणनीतिक साझेदार और क्वाड का सदस्य है, लेकिन ईरान से चाबहार बंदरगाह और तेल आयात के पुराने संबंध भी हैं। रूस से एस-400 और तेल समझौते जारी हैं, जबकि वेनेजुएला भी वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हो सकता है। ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र में तत्काल युद्धविराम की मांग की है। प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 में कहा था, “यह युद्ध का युग नहीं है”, लेकिन ट्रम्प प्रशासन इसे कमजोरी के रूप में पढ़ता दिखाई देता है। भारत को रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।

तीन महाद्वीप, सात देश और 20 प्रतिशत ऊर्जा संकट—यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता का संकेत है। क्यूबा पर प्रतिबंध कड़े किए गए हैं, ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ खनिजों के लिए दबाव बढ़ रहा है और पेंटागन 2027 तक ‘मल्टी-डोमेन ऑपरेशन’ की तैयारी में जुटा है। समाधान के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं। पहला, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो के बावजूद ‘यूनाइटिंग फॉर पीस’ प्रस्ताव का विकल्प मौजूद है। दूसरा, ईरान परमाणु समझौता (जेसीपीओए) को यूरोप और भारत की मध्यस्थता से पुनर्जीवित किया जा सकता है। तीसरा, यदि 2026 के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करते हैं तो ‘वॉर पॉवर्स एक्ट’ के जरिए ट्रम्प की सैन्य शक्तियों पर अंकुश लगाया जा सकता है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने शपथ लेते समय कहा था कि वे अंतहीन युद्धों को समाप्त करेंगे, लेकिन 16 महीनों में सात नए मोर्चे खुल चुके हैं। इतिहास गवाह है कि अफगानिस्तान और इराक से अमेरिका जीत नहीं, बल्कि थकान लेकर लौटा था। ईरान 8 करोड़ की आबादी वाला विशाल देश है, जिसका पहाड़ी भूगोल और पूरे क्षेत्र में फैला प्रॉक्सी नेटवर्क इसे बेहद जटिल बनाता है। यह त्वरित युद्ध नहीं, बल्कि लंबे दलदल में बदलने की आशंका वाला संघर्ष साबित हो सकता है।

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