संपादकीय
08 Jun, 2026

मां शारदा शक्तिपीठ से उठी नारी शक्ति की बुलंद आवाज: अब मंदिर के प्रबंधन में भी महिलाओं की हो बराबर भागीदारी

मैहर की मां शारदा प्रबंधन समिति में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी की मांग ने देशभर के मंदिरों में लैंगिक समानता और समावेशी प्रबंधन पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दिया है।

मैहर, 08 जून।

विंध्य की पावन धरा पर स्थित मां शारदा शक्तिपीठ केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि अब ‘समानता’ की बहस का नया मंच भी बन गया है। मैहर की भाजपा नेत्री एवं जिला पंचायत सदस्य जयंती तिवारी ने मां शारदा प्रबंधन समिति में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी की मांग उठाकर एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है। जब मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने, पूजा करने और चढ़ावा चढ़ाने में महिला और पुरुष समान हैं, तो मंदिर चलाने वाली समिति में यह भेदभाव क्यों?

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, क्षेत्रीय सांसद और विधायक को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं की अनुपस्थिति से व्यवस्था असंवेदनशील बनी रहती है। यह मांग केवल मैहर तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के धर्मस्थलों के लिए एक आईना बन गई है।

मां शारदा प्रबंधन समिति का गठन मध्यप्रदेश लोक न्यास अधिनियम के तहत हुआ है। वर्तमान में कलेक्टर सतना इसके पदेन अध्यक्ष हैं और 11 सदस्यीय समिति में एक भी महिला नहीं है। जबकि वास्तविकता यह है कि नवरात्र के दौरान 60 प्रतिशत से अधिक श्रद्धालु महिलाएं होती हैं। सफाई, प्रसाद वितरण, कन्या पूजन और भीड़ नियंत्रण में हजारों महिला स्वयंसेवक लगी रहती हैं, लेकिन शौचालय, स्तनपान कक्ष, वस्त्र परिवर्तन कक्ष और रात्रिकालीन सुरक्षा जैसे मुद्दे हर बार ‘बाद में देखेंगे’ वाली फाइलों में दब जाते हैं। जयंती तिवारी का तर्क है कि जिस पीड़ा को पुरुष समझ ही नहीं सकते, उसका समाधान पुरुष-केंद्रित समिति कैसे कर सकती है?

यह विसंगति केवल मैहर की नहीं है। देश के प्रमुख मंदिर न्यासों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के 29 सदस्यीय बोर्ड में केवल दो महिलाएं हैं। श्री वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के सभी सदस्य पुरुष हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास और महाकालेश्वर प्रबंध समिति में भी महिला प्रतिनिधित्व नगण्य या शून्य है। सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट में भी महिलाओं की संख्या बेहद सीमित है। विडंबना यह है कि जिन देवियों के नाम पर ये संस्थान संचालित हैं, उनके मानवीय रूपों को ही प्रबंधन से बाहर रखा गया है।

संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है। वहीं अनुच्छेद 51(क)(ई) ऐसी प्रथाओं के त्याग की बात करता है जो स्त्री की गरिमा के विरुद्ध हों। ऐसे में निर्णय-प्रक्रिया से महिलाओं को बाहर रखना क्या गरिमा के अनुरूप माना जा सकता है?

महिला भागीदारी के पक्ष में संवैधानिक, धार्मिक और व्यावहारिक तीनों आधार मौजूद हैं। 2018 के सबरीमाला फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक धर्मस्थलों में लिंग आधारित भेदभाव असंवैधानिक है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के तहत संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हो चुका है, तो धर्मस्थल इससे अछूते क्यों रहें?

शाक्त परंपरा स्त्री को ‘आदिशक्ति’ मानती है। दुर्गासप्तशती में कहा गया है— ‘स्त्रियः समस्ताः तव देवि भेदाः।’ मनुस्मृति का ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ श्लोक केवल आरती तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि देवी सृष्टि की संचालिका हैं तो मानवी स्त्री संस्था की संचालिका क्यों नहीं हो सकती?

कुछ धर्माचार्यों का मत है कि आगम शास्त्र में गर्भगृह और प्रशासन पुरुषों के अधीन बताए गए हैं, लेकिन इतिहास साक्षी है कि परंपराएं समय के साथ बदली हैं। तमिलनाडु के चिदंबरम नटराज मंदिर में महिलाओं का प्रवेश, शनि शिंगणापुर में चबूतरे पर महिलाओं की पूजा और केरल के मंदिरों में महिला पुजारियों की नियुक्ति के बाद धर्म खतरे में नहीं पड़ा, बल्कि अधिक समावेशी और उदार बना। परंपरा के नाम पर बहिष्कार करना धर्म नहीं, बल्कि वर्चस्व की राजनीति है।

व्यावहारिक दृष्टि से भी महिला भागीदारी के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। तिरुपति में महिला ट्रस्टियों की नियुक्ति के बाद महिला यात्रियों के लिए अलग कतार, सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन और स्तनपान कक्ष जैसी सुविधाएं शुरू हुईं। कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर में महिला सदस्य शामिल होने के बाद भीड़ प्रबंधन और स्वच्छता व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। महिला पदाधिकारी सुरक्षा को खर्च नहीं, बल्कि निवेश मानती हैं।

मां शारदा विद्या और विवेक की देवी हैं। विवेक का पहला लक्षण समता है। जिस दिन प्रबंधन समिति की बैठक में ‘जय माता दी’ के साथ ‘सुनिए बहन जी’ की आवाज भी समान सम्मान के साथ गूंजेगी, उस दिन नवरात्र का वास्तविक उद्देश्य सार्थक होगा। जयंती तिवारी की यह मांग राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सुधार का प्रस्ताव है। यदि मैहर में ‘शक्ति’ को ‘सत्ता’ में भागीदारी मिलती है तो काशी से कन्याकुमारी तक एक नया संदेश जाएगा कि 21वीं सदी का भारत मंदिर की चौखट से लेकर नीति की चौपाल तक महिलाओं को बराबरी का स्थान देने के लिए तैयार है।

इसके लिए राज्य सरकारों को धर्मस्व अधिनियमों में संशोधन कर सभी न्यास बोर्डों में कम से कम 33 प्रतिशत महिला आरक्षण अनिवार्य करना चाहिए। मध्यप्रदेश सरकार मैहर से इसकी शुरुआत कर सकती है। चयन केवल महिला होने के आधार पर नहीं, बल्कि धर्म, विधि, वित्त और प्रशासन में अनुभवी महिलाओं को प्राथमिकता देकर होना चाहिए। अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष जैसे प्रमुख पदों में से कम से कम एक पद महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता है। साथ ही सुरक्षा, स्वच्छता और शिकायत निवारण के लिए महिला उपसमिति गठित की जानी चाहिए।

सामाजिक सहमति भी इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार बने। धर्म संसदों, शंकराचार्यों और महामंडलेश्वरों की बैठकों में महिला संतों और विदुषियों को समान रूप से शामिल किया जाए। अब समय आ गया है कि ‘बेटी बचाओ’ के साथ ‘बेटी को बिठाओ’ का नारा भी समाज में गूंजे, क्योंकि देवी के घर में भेदभाव रखना स्वयं देवी के सम्मान के विरुद्ध है।

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