मुंबई, 09 जून।
भारतीय सिनेमा के 'सस्पेंस-थ्रिलर' सम्राट कहे जाने वाले दिग्गज फिल्मकार राज खोसला की आज पुण्यतिथि है। चार दशकों से अधिक समय तक अपनी कालजयी फिल्मों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले खोसला का सफर एक पार्श्वगायक बनने के सपने के साथ शुरू हुआ था, लेकिन नियति ने उन्हें निर्देशन की दुनिया का उस्ताद बना दिया।
गायकी से निर्देशन तक का सफर:
31 मई 1925 को लुधियाना में जन्मे राज खोसला 19 वर्ष की आयु में गायक बनने का सपना संजोकर मुंबई पहुंचे थे। हालांकि, रंजीत स्टूडियो में स्वर परीक्षण में सफल होने के बावजूद उन्हें बतौर गायक अवसर नहीं मिला। यही असफलता उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, जिसने उन्हें सिनेमा के परदे के पीछे एक नई पहचान की ओर अग्रसर किया।
गुरुदत्त के सानिध्य से मिली पहली बड़ी पहचान:
संघर्ष के शुरुआती दिनों में अभिनेता देव आनंद की मदद से उन्हें गुरुदत्त के सहायक के रूप में काम करने का अवसर मिला। वर्ष 1954 में फिल्म 'मिलाप' से स्वतंत्र निर्देशक के तौर पर शुरुआत करने वाले खोसला ने 'सी.आई.डी.' (1956), 'काला पानी' (1958) और 'सोलहवां साल' जैसी बेहतरीन फिल्मों से भारतीय सिनेमा में अपनी धाक जमाई।
रहस्य और संगीत का अद्भुत संगम:
राज खोसला की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत उनका सस्पेंस और मखमली संगीत था। वर्ष 1964 की सुपरहिट फिल्म 'वह कौन थी' ने साधना की रहस्यमयी छवि और खोसला के निर्देशन के दम पर दर्शकों को रोमांचित कर दिया। वहीं, 1971 की फिल्म 'मेरा गांव मेरा देश' में उन्होंने एक्शन और मनोरंजन का ऐसा मिश्रण पेश किया कि विनोद खन्ना का खलनायक वाला किरदार आज भी सिनेमा प्रेमियों के जेहन में जीवंत है।
अविस्मरणीय विरासत:
'मैं तुलसी तेरे आंगन की' (1978) और 'दोस्ताना' (1980) जैसी सुपरहिट फिल्मों के जरिए उन्होंने साबित किया कि वे हर विधा में पारंगत थे। करीब चार दशकों तक अपनी सशक्त पटकथा और यादगार निर्देशन से भारतीय सिनेमा को समृद्ध करने वाले राज खोसला का 09 जून 1991 को निधन हो गया। आज भी उनकी फिल्में नए फिल्मकारों के लिए एक पाठशाला और दर्शकों के लिए एक बेहतरीन अनुभव मानी जाती हैं।













