भोपाल, 09 जून।
मध्यप्रदेश में बिजली की उपलब्धता बढ़ी, पर उपभोक्ता की राहत घट गई। कारण हैं वे दीर्घकालीन बिजली खरीद समझौते (पीपीए), जो कभी संकट से निपटने का हल थे, आज आर्थिक बोझ बन गए हैं। मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी को बिजली खरीदे बिना भी निजी उत्पादक कंपनियों को ‘फिक्स चार्ज’ के रूप में हर साल हजारों करोड़ रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। वर्ष 2026-27 में यह राशि 11,210 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। विडंबना यह है कि प्रदेश के पास जरूरत से ज्यादा बिजली है, फिर भी जनता को महंगी बिजली का बिल भरना पड़ रहा है।
शर्त क्या है : लो या न लो, पैसा दो
करीब दो दशक पहले प्रदेश में बिजली संकट था। मांग अधिक और उत्पादन कम था। तब राज्य सरकार ने ताप, जल, विंड और सोलर परियोजनाओं से 20 से 25 वर्ष के लिए पीपीए किए। अनुबंध की शर्त थी कि बिजली खरीदो या न खरीदो, ‘कैपेसिटी चार्ज’ यानी फिक्स चार्ज देना अनिवार्य होगा। उस समय यह शर्त निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जरूरी मानी गई। कंपनियों ने हजारों करोड़ रुपये लगाकर प्लांट लगाए, पर आज स्थिति उलट है। प्रदेश में स्थापित क्षमता 27,126 मेगावाट तक पहुंच गई है, जबकि अधिकतम मांग 17,000 मेगावाट के आसपास रहती है। यानी प्रदेश बिजली उत्पादन के मामले में सरप्लस है। इसके बावजूद मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी को अनुबंधित कंपनियों को हर हाल में तय भुगतान करना पड़ रहा है।
11,210 करोड़ का गणित, कहां से आएगा पैसा
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अनुमानित 11,210 करोड़ रुपये का फिक्स चार्ज सीधे बिजली दरों में जुड़ता है। ‘एनर्जी चार्ज’ यानी जितनी बिजली ली, उतना पैसा देना तर्कसंगत है, लेकिन ‘फिक्स चार्ज’ बिना एक यूनिट बिजली लिए भी देना पड़ता है। नतीजा यह है कि डिस्कॉम की लागत बढ़ती है और वह यह भार टैरिफ के जरिए आम उपभोक्ता पर डाल देता है। घरेलू उपभोक्ता 8 रुपये प्रति यूनिट तक भुगतान कर रहा है, जबकि उद्योग पलायन की सोच रहे हैं। महाकौशल उद्योग संघ के अध्यक्ष डी.आर. जेसवानी कहते हैं, “सरप्लस बिजली होने के बावजूद बिजली महंगी है। पीपीए की शर्तों का रिव्यू नहीं हुआ तो उद्योगों की कमर टूट जाएगी।”
क्यों अड़चन बने अनुबंध
पहला कारण मांग का गलत आकलन है। 2000 के दशक में औद्योगिक विकास दर 12 प्रतिशत मानी गई थी, जबकि वास्तविक वृद्धि 6-7 प्रतिशत रही। बिजली की मांग उतनी नहीं बढ़ी, जितनी अनुमानित थी।
दूसरा कारण सस्ती बिजली के विकल्पों का उपलब्ध होना है। सोलर टैरिफ आज 2.50 रुपये प्रति यूनिट तक आ गया है, जबकि पुराने थर्मल पीपीए में 4.50 से 5.50 रुपये प्रति यूनिट की दरें तय हैं। इसके बावजूद ‘मस्ट रन’ शर्त के कारण महंगी बिजली भी लेनी पड़ती है।
तीसरा कारण कानूनी जटिलता है। पीपीए ‘सॉवरेन गारंटी’ वाले अनुबंध हैं। इन्हें एकतरफा रद्द करने पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में भारी जुर्माना लग सकता है।
समाधान क्या है, रास्ते बंद नहीं, कठिन जरूर
रिटायर्ड अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी को लगभग 11,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। अब दीर्घकालीन अनुबंधों की समीक्षा की जरूरत है। हालांकि उन्हें रद्द करना अंतिम विकल्प होना चाहिए। उससे पहले चार रास्तों पर विचार किया जा सकता है।
केंद्र सरकार की ‘शक्ति नीति’ के तहत पुराने पीपीए को बाजार दर के अनुरूप लाने के लिए कंपनियों से बातचीत की जाए। कई राज्यों ने इस प्रक्रिया में दरों में लगभग 1 रुपये प्रति यूनिट तक कमी करवाई है।
महंगी थर्मल बिजली को सस्ती सोलर और विंड ऊर्जा के साथ ‘बंडल’ कर औसत दर घटाई जा सकती है। एनटीपीसी यह मॉडल अपना चुका है।
सरप्लस बिजली को पावर एक्सचेंज के माध्यम से दूसरे राज्यों को बेचा जाए। मप्र ने 2023-24 में लगभग 4,000 करोड़ रुपये की बिजली बेची भी थी, लेकिन उससे फिक्स चार्ज की पूरी भरपाई नहीं हो पाती।
विधायी स्तर पर भी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 86 के तहत राज्य आयोग को जनहित में टैरिफ संशोधन का अधिकार है। मप्र विद्युत नियामक आयोग को ‘कॉस्ट प्लस’ मॉडल की बजाय ‘कॉम्पिटिटिव बिडिंग’ को सख्ती से लागू करना चाहिए।
जनता क्यों भुगते पिछली सरकारों की गलती
वर्षों पहले सत्ता परिवर्तन के दौर में बिजली कटौती बड़ा राजनीतिक मुद्दा था। हर सरकार ने ‘जीरो पावर कट’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जल्दबाजी में पीपीए पर हस्ताक्षर किए। ‘बिजली की कमी न हो’ की चिंता में लागत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। आज जब उत्पादन जरूरत से अधिक है, तो वही अनुबंध जंजीर बन गए हैं। सवाल यह है कि नीति-निर्माण में दूरदर्शिता की कमी की कीमत क्या हमेशा आम आदमी ही चुकाएगा?
‘अनुबंध’ की समीक्षा ही ‘अंधेर’ से बचाएगी
बिजली अब विलासिता नहीं, आवश्यकता है। किसान, छात्र, गृहिणी और उद्योग, सभी की उत्पादकता बिजली की दरों से जुड़ी है। यदि 11,210 करोड़ रुपये का ‘गारंटीड पेमेंट’ जारी रहा, तो मध्यप्रदेश ‘सरप्लस स्टेट’ होकर भी ‘कॉस्टली स्टेट’ कहलाएगा।
राज्य सरकार को तत्काल एक ‘पीपीए रिव्यू कमेटी’ बनाकर उसमें विधि विशेषज्ञों, वित्तीय विशेषज्ञों और उपभोक्ता प्रतिनिधियों को शामिल करना चाहिए। ‘उज्ज्वल’ योजना से घर-घर बिजली पहुंची, अब उचित दर पर बिजली पहुंचाना अगली चुनौती है। वरना इतिहास पूछेगा कि जब बिजली उपलब्ध थी, तब जनता आर्थिक अंधेरे में क्यों थी? और जवाब होगा कि गारंटी कंपनियों को मिली थी, जनता को नहीं।
अनुबंध पवित्र होते हैं, लेकिन जनता का हित सर्वोपरि है। समय आ गया है कि पीपीए की शर्तों को जनता की शर्तों के अनुरूप बनाया जाए।














