भोपाल, 09 जून।
एक रिपोर्ट के अनुसार 81 प्रतिशत माता-पिता बच्चों के साथ ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं, जबकि 45 प्रतिशत खरीदारी में जेन अल्फा की राय निर्णायक भूमिका निभाती है। इसे ‘हाई कंट्रोल, हाई इन्फ्लुएंस’ पीढ़ी बताया गया है, जो पारिवारिक अर्थव्यवस्था की दिशा बदल रही है।
भारत में 9 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चों की यह पीढ़ी अब केवल तकनीक की उपभोक्ता नहीं रही, बल्कि घरेलू खरीदारी निर्णयों को प्रभावित करने वाली मजबूत ताकत बन चुकी है। ‘जेन अल्फा डिकोडेड : द कंज्यूमर ब्रांड डायनेमिक्स’ रिपोर्ट में बताया गया है कि 40 से 45 प्रतिशत परिवारों के खरीद निर्णयों में बच्चों की भूमिका अहम हो गई है।
रिपोर्ट के अनुसार 73.5 प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्टफोन और 60.3 प्रतिशत के पास लैपटॉप की सुविधा है। 84 प्रतिशत अभिभावक बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखते हैं, लेकिन 45 प्रतिशत खरीदारी में बच्चे स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं। 81 प्रतिशत माता-पिता उनके साथ ऑनलाइन शॉपिंग में शामिल होते हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया साझा हो गई है।
जेन अल्फा 2010 के बाद जन्मी वह पीढ़ी है जो डिजिटल वातावरण में पली-बढ़ी है। लॉकडाउन, ऑनलाइन क्लास और स्मार्टफोन ने इनके व्यवहार को पूरी तरह डिजिटल बना दिया है। यह पीढ़ी कपड़े, गैजेट, भोजन और यात्रा जैसे फैसलों में भी माता-पिता से पहले जानकारी हासिल कर लेती है।
पहले जहां बच्चों की मांग को ‘पेस्टर पावर’ कहा जाता था, अब वह ‘पार्टनर पावर’ में बदल गई है। 54 प्रतिशत माता-पिता टीवी और ओटीटी पर बच्चों की पसंद को प्राथमिकता देते हैं, जबकि 53 प्रतिशत बच्चे लगातार स्क्रीन पर सक्रिय रहते हैं, जिससे उनका प्रभाव और बढ़ गया है।
रिपोर्ट में इसे ‘हाई कंट्रोल, हाई इन्फ्लुएंस’ बताया गया है, जहां 84 प्रतिशत माता-पिता निगरानी का दावा करते हैं, लेकिन व्यवहारिक नियंत्रण सीमित दिखाई देता है। कई बच्चे जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन घरेलू जिम्मेदारियों में अभी पीछे हैं।
डिजिटल प्रभाव के कारण 2 लाख करोड़ रुपये के ‘किडफ्लुएंसर’ बाजार का अनुमान है, जिसमें ब्रांड अब सीधे बच्चों को लक्ष्य बना रहे हैं। कार्टून और गेमिंग आधारित विज्ञापन इस ट्रेंड का हिस्सा बन चुके हैं।
इस बदलाव का सकारात्मक पहलू यह है कि बच्चे गुणवत्ता और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर जागरूक हो रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर तात्कालिक उपभोग की आदत भी बढ़ रही है। दो घंटे में डिलीवरी और एक क्लिक भुगतान संस्कृति उनके धैर्य को प्रभावित कर रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार समाधान रोकने में नहीं, बल्कि डिजिटल पेरेंटिंग में है। वित्तीय शिक्षा, स्क्रीन-फ्री नियम और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देकर बच्चों को जिम्मेदार उपभोक्ता बनाया जा सकता है।
आज माता-पिता केवल नियंत्रक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भूमिका में आ गए हैं। जेन अल्फा की उंगली स्क्रीन पर जरूर है, लेकिन उसका असर अब परिवार की जेब तक पहुंच चुका है और यही भविष्य की उपभोक्ता संस्कृति को तय कर रहा है।














