भोपाल, 09 जून।
बड़वानी के आदिवासियों ने जो कर दिखाया, वह केवल दो किलोमीटर सड़क का निर्माण नहीं, बल्कि व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है। जब पंचायत से लेकर प्रशासन तक वर्षों तक गुहार लगाने के बाद भी सुनवाई नहीं हुई, तब 35 परिवारों के 250 ग्रामीणों ने 40 दिनों तक श्रमदान कर पहाड़ काटकर अपने लिए रास्ता बना लिया। एक बार फिर साबित हुआ कि जब कुर्सियां सो जाती हैं, तब फावड़े इतिहास लिखते हैं।
यह घटना बिहार के दशरथ मांझी की याद दिलाती है, लेकिन फर्क इतना है कि यहां एक नहीं, पूरा गांव मांझी बन गया। यह प्रेरणा का विषय जरूर है, पर इससे कहीं बड़ा सवाल शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर खड़ा होता है। सड़क, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं नागरिकों का अधिकार हैं, उपकार नहीं। यदि जनता को अपनी सड़क खुद बनानी पड़े, तो योजनाओं और तंत्र का औचित्य क्या रह जाता है?
रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों ने हर सरकारी दरवाजा खटखटाया, आवेदन दिए और नेताओं के आश्वासन भी सुने, लेकिन नतीजा शून्य रहा। बरसात में गांव टापू बन जाता था और मरीजों तथा गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता था। आखिरकार लोगों ने सरकार का इंतजार छोड़ अपने पुरुषार्थ पर भरोसा किया।
यह सामुदायिक भागीदारी का अनुकरणीय उदाहरण है, लेकिन इसे प्रशासन की सफलता नहीं कहा जा सकता। अफसरशाही की संवेदनहीनता और फाइलों में दबे विकास कार्य आज भी दूरदराज के गांवों की सबसे बड़ी समस्या हैं। कागजों पर योजनाएं बनती हैं, बजट आवंटित होता है, लेकिन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचते-पहुंचते विकास दम तोड़ देता है।
बड़वानी के ग्रामीणों ने साबित किया है कि हौसला हो तो पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं। लेकिन जब पूरा गांव दशरथ मांझी बनने को मजबूर हो जाए, तो यह जनता की नहीं, व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। सरकार को इन ग्रामीणों के पुरुषार्थ को सलाम करने के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी गांव को अपने अधिकार के लिए पहाड़ न काटना पड़े।













