प्रशांत महासागर में सुपर अल नीनो की संभावित वापसी को लेकर वैज्ञानिक चेतावनियों ने भारत के मानसून, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर गंभीर खतरे की आशंका को उजागर किया है, जिससे सूखे और भीषण गर्मी की स्थिति बन सकती है।
19 मई।
प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ने से देश के कई हिस्सों में सूखे और गर्मी का खतरा
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी का सबसे बड़ा निर्धारक मानसून एक बार फिर प्रकृति की अनिश्चितता के सामने खड़ा है। मौसम वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि प्रशांत महासागर में ‘सुपर अल नीनो’ की वापसी हो सकती है और इसका सीधा असर भारत के मानसून पर पड़ेगा।
अगर यह अनुमान सही साबित हुआ तो देश के कई हिस्सों में सूखे, असामान्य गर्मी और अनियमित बारिश का दौर लौट सकता है। सवाल यह है कि क्या भारत इस बार भी प्रकृति की इस मार को झेलने के लिए तैयार है।
अल नीनो स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है ‘छोटा बालक’। यह एक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी और मध्य हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इस गर्म पानी के कारण हवाओं का सामान्य पैटर्न बदल जाता है।
जब समुद्र का तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है और यह स्थिति कई महीनों तक बनी रहती है, तो इसे अल नीनो कहा जाता है। लेकिन जब तापमान में बढ़ोतरी 2 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चली जाए और असर वैश्विक स्तर पर दिखे, तो इसे ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है।
2015-16 में आए सुपर अल नीनो ने भारत में 15 साल में सबसे खराब सूखा लाया था। फसलें चौपट हुई थीं, जलाशय सूख गए थे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी।
मौसम विभाग और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक चल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यह रफ्तार बनी रही, तो अगले कुछ महीनों में यह सुपर अल नीनो में बदल सकता है।
इसका सबसे बड़ा असर भारत के मानसून पर होगा। अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर की गर्म हवाएं भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाओं को कमजोर कर देती हैं। नतीजा — कम बारिश, देर से आने वाला मानसून और असमान वितरण।
राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कुछ हिस्से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। वहीं दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर में भी असामान्य गर्मी और सूखे का खतरा बना रहेगा।
भारत की 60 प्रतिशत कृषि मानसून पर निर्भर है। किसान आज भी बारिश के भरोसे खेती करते हैं। यदि मानसून कमजोर रहा, तो सीधा असर फसल उत्पादन, खाद्य महंगाई और ग्रामीण आय पर पड़ेगा।
धान, सोयाबीन, मक्का और दलहन जैसी खरीफ फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी। सिंचाई के साधन न होने पर छोटे और सीमांत किसान सबसे पहले प्रभावित होंगे।
कम बारिश से जलाशयों में पानी का स्तर गिरेगा। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य पहले से ही जल संकट से जूझ रहे हैं। सुपर अल नीनो इस समस्या को और गहरा कर सकता है।
अल नीनो के दौरान भारत में गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है। 2015-16 में देश के कई हिस्सों में तापमान 47-48 डिग्री तक पहुंच गया था। इस बार भी लू और हीटवेव का खतरा बढ़ेगा।
कृषि उत्पादन घटने से खाद्य महंगाई बढ़ेगी। ग्रामीण मांग घटेगी, जिसका असर औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर पड़ेगा।
इतिहास गवाह है कि जब भी सुपर अल नीनो आया है, भारत का मानसून प्रभावित हुआ है। 1997-98 के सुपर अल नीनो के कारण भारत में सामान्य से 17 प्रतिशत कम बारिश हुई थी। 2015-16 में देश में 14 प्रतिशत कम बारिश हुई और 330 जिले सूखाग्रस्त घोषित किए गए थे। 2009 में अल नीनो के कारण 22 प्रतिशत कम बारिश हुई थी, जो पिछले 37 साल में सबसे कम थी।
हर बार सरकार को राहत पैकेज, सूखा राहत और जल प्रबंधन पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ा।
पिछले कुछ सालों में भारत ने जल संरक्षण, सिंचाई परियोजनाओं और मौसम पूर्वानुमान में निवेश बढ़ाया है। ‘जल जीवन मिशन’, ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ और ‘अटल भूजल योजना’ जैसी योजनाएं इसी दिशा में हैं। मौसम विभाग ने भी पूर्वानुमान प्रणाली को मजबूत किया है। अब 15 दिन पहले तक मानसून की गति और तीव्रता का अनुमान लगाया जा सकता है।
लेकिन चुनौती यह है कि जमीनी स्तर पर तैयारियां अभी भी अधूरी हैं। जल संरक्षण के काम कई जगह कागजों तक सीमित हैं। कई राज्यों में सूखा राहत के नाम पर सिर्फ घोषणाएं होती हैं।
किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर रुख करना होगा। बाजरा, ज्वार और मूंग जैसी फसलें अल नीनो के दौरान बेहतर विकल्प हो सकती हैं। खेतों में तालाब, चेक डैम और ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देना होगा। मौसम विभाग की चेतावनियों को गांव-गांव तक पहुंचाना होगा, ताकि किसान समय पर तैयारी कर सकें।
राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सूखा घोषित करने में देरी न हो और राहत समय पर पहुंचे।
अल नीनो कोई नई घटना नहीं है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसे और खतरनाक बना दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल नीनो की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ रही हैं। भारत जैसे विकासशील देश, जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी है, सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। ऐसे में सिर्फ प्रतिक्रिया देना काफी नहीं है। हमें जलवायु अनुकूलन और लचीलापन बढ़ाने की दिशा में काम करना होगा।
अभी यह तय नहीं है कि सुपर अल नीनो कितना तीव्र होगा और भारत को कितना प्रभावित करेगा, लेकिन चेतावनी साफ है — प्रकृति फिर से परीक्षा ले सकती है। भारत के पास दो विकल्प हैं। पहला, हर बार की तरह संकट आने पर राहत और बचाव में जुटना। दूसरा, अभी से तैयारी करना, ताकि नुकसान कम से कम हो।
किसानों के खेतों में पानी, बाजारों में अनाज की स्थिरता और शहरों में बिजली-पानी की आपूर्ति — सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं। अगर सुपर अल नीनो लौटा, तो यह सिर्फ मौसम की घटना नहीं होगी, बल्कि हमारी नीतियों, तैयारियों और संवेदनशीलता की भी परीक्षा होगी।