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01 Aug, 2026

पेंच टाइगर रिजर्व में 10 साल में दोगुने हुए बाघ, बढ़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष

पेंच टाइगर रिजर्व में पिछले एक दशक में बाघों की संख्या लगभग दोगुनी होने के साथ क्षेत्रीय संघर्ष और मानव-वन्यजीव टकराव की घटनाओं में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

छिंदवाड़ा, 01 अगस्त।

मध्य प्रदेश के प्रमुख पेंच टाइगर रिजर्व ने पिछले एक दशक में बाघ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। बीते दस वर्षों के दौरान यहां बाघों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। इस बढ़ोतरी को वन्यजीव संरक्षण की बड़ी सफलता माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी सामने आने लगी हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 में पेंच में करीब 65 बाघ दर्ज किए गए थे। वर्ष 2014 में यह संख्या बढ़कर 69 हो गई। वर्ष 2018 की गणना में 87 बाघ दर्ज हुए और वर्ष 2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना के अनुसार यह आंकड़ा 123 तक पहुंच गया। वर्ष 2026 की गणना के नतीजे अभी जारी नहीं हुए हैं, हालांकि वन विभाग का अनुमान है कि वर्तमान में भी संख्या इसी स्तर के आसपास बनी हुई है।

बाघों की बढ़ती संख्या के साथ उनके बीच टेरिटरी को लेकर संघर्ष भी तेज हुआ है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक प्रत्येक वयस्क बाघ को अपने लिए एक निश्चित क्षेत्र की आवश्यकता होती है। ऐसे में आबादी बढ़ने पर युवा बाघ नए इलाके की तलाश में जंगल छोड़कर बफर जोन और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की ओर जाने लगे हैं।

पेंच टाइगर रिजर्व लंबे समय से मध्य भारत के सबसे समृद्ध बाघ आवासों में शामिल रहा है। यहां के घने जंगल, पर्याप्त शिकार प्रजातियां और अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियां बाघों के संरक्षण के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। इसी कारण यहां बाघों की संख्या लगातार बढ़ती रही है।

पेंच से लगे गांवों के लोगों का कहना है कि अब खेतों और जंगल की सीमा पर पहले की तुलना में बाघों की मौजूदगी अधिक दिखाई देने लगी है। कई स्थानों पर मवेशियों पर हमले हुए हैं, जिससे ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। खेती और जंगल आधारित आजीविका पर निर्भर परिवारों के लिए यह स्थिति चिंता का कारण बन गई है। महुआ, तेंदूपत्ता और अन्य वन उपज संग्रह के दौरान भी लोगों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है।

पिछले कुछ वर्षों में मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी कई घटनाएं भी सामने आई हैं। दो अप्रैल 2026 को पेंच टाइगर रिजर्व के छिंदवाड़ा क्षेत्र के कुम्भपानी वन परिक्षेत्र की रमपुरी बीट के बफर जोन में महुआ बीनने गए महेंद्र मांडेकर की बाघ के हमले में मौत हो गई थी। इससे पहले 31 दिसंबर 2025 को चौरई क्षेत्र के निकट बफर जोन में बिछुआ के किशनपुर निवासी 59 वर्षीय बलराम डेहरिया की वन्यप्राणी के हमले में जान चली गई थी। छह जनवरी 2026 को गुमतरा कोर वन परिक्षेत्र के महादेव घाट के पास मिले एक व्यक्ति के शव की जांच में भी बाघ के हमले की पुष्टि हुई थी। इन घटनाओं के बाद स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ी है और वन विभाग पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का दबाव भी बढ़ा है।

वन विभाग के अनुसार वर्तमान में पेंच में लगभग 79 वयस्क बाघ हैं, जबकि शेष संख्या शावकों की है। विभाग का कहना है कि नई बाघ गणना के परिणाम आने के बाद वास्तविक स्थिति और स्पष्ट होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण प्रयास सफल रहे हैं, लेकिन अब केवल कोर क्षेत्र की सुरक्षा पर्याप्त नहीं होगी। बफर जोन और उससे जुड़े गांवों को भी संरक्षण प्रबंधन की रणनीति में सक्रिय रूप से शामिल करना आवश्यक होगा।

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