अश्काबाद, 8 अक्टूबर।
भारत ने मध्य एशिया में अपने रक्षा निर्यात को लेकर एक अहम कदम बढ़ाया है। ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ आकाश मिसाइल प्रणाली की बिक्री का समझौता हुआ है। दोनों देश लंबे समय से रूसी और चीनी हथियारों का इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे में भारतीय वायु रक्षा प्रणाली की खरीद को क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक और रक्षा मौजूदगी से जोड़कर देखा जा रहा है।
इस सौदे में आकाश मिसाइल प्रणाली के साथ राजेंद्र रडार नेटवर्क और रसद एवं रखरखाव पैकेज भी शामिल हैं। हालांकि, कितनी मिसाइल बैटरियां खरीदी जाएंगी और समझौते की कुल कीमत कितनी है, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। यह समझौता वर्ष 2022 में आर्मेनिया के साथ हुए भारत के पहले आकाश निर्यात सौदे के बाद हुआ है।
आकाश भारत में विकसित सतह से हवा में मार करने वाली मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली है। इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने विकसित किया है। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड इसके निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
आकाश की परिचालन मारक क्षमता करीब 4.5 से 25 किलोमीटर तक है। यह 100 मीटर से लेकर करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ रहे हवाई लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। करीब 5.87 मीटर लंबी मिसाइल का वजन लगभग 710 किलोग्राम है और इसकी गति करीब 2.5 मैक बताई गई है।
यह प्रणाली लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे कई हवाई खतरों से निपटने में सक्षम है। एक बैटरी स्तर पर यह कई लक्ष्यों को एक साथ ट्रैक कर सकती है। इसकी लक्ष्य पहचान और निगरानी में राजेंद्र त्रि-आयामी चरणबद्ध रडार की महत्वपूर्ण भूमिका है।
ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान में आकाश की पहुंच इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि मध्य एशिया लंबे समय से रूस और चीन के रक्षा प्रभाव वाला क्षेत्र रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के हथियार निर्यात में गिरावट आई है और चीन ने क्षेत्र में अपनी रक्षा मौजूदगी मजबूत की है।
इसी बीच भारत के रक्षा निर्यात में भी तेजी आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया। पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले इसमें 61 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई। भारत अब 80 से अधिक देशों को हथियार और सैन्य उपकरण निर्यात कर रहा है।
ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ आकाश का सौदा इस विस्तार को मध्य एशिया तक पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे क्षेत्र के देशों को रक्षा उपकरणों के लिए रूस और चीन के अलावा एक और विकल्प मिलता है।
आकाश का निर्यात ऐसे समय हुआ है, जब चीन उज्बेकिस्तान को जे-10सीई लड़ाकू विमान दे चुका है। ताशकंद में इन विमानों के प्रदर्शन के बाद मध्य एशिया में भारत की वायु रक्षा प्रणाली की मौजूदगी को रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
आकाश के उन्नत संस्करणों में आकाश प्राइम और आकाश-एनजी शामिल हैं। इनमें बेहतर सेंसर और अन्य तकनीकी सुधार किए गए हैं। मोबाइल प्रक्षेपण प्रणाली, रडार, बैटरी नियंत्रण केंद्र और समूह नियंत्रण केंद्र मिलकर इसकी संचालन क्षमता को मजबूत करते हैं।
भारत की रक्षा क्षेत्र में बढ़ती क्षमता का असर नौसेना के सौदों में भी दिखाई दे रहा है। 6 अक्टूबर 2026 को रक्षा मंत्रालय ने ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ 661.50 करोड़ रुपये का समझौता किया। इसके तहत भारतीय नौसेना के युद्धपोतों के लिए ब्रह्मोस अग्नि नियंत्रण प्रणाली और प्रक्षेपक खरीदे जाएंगे। इस व्यवस्था में 68 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल होगा।
मध्य एशिया में आकाश की पहुंच और देश में रक्षा उत्पादन के विस्तार को भारत के बढ़ते रक्षा निर्यात की बड़ी तस्वीर के तौर पर देखा जा रहा है। ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान द्वारा भारतीय प्रणाली का चयन क्षेत्र में रक्षा आपूर्तिकर्ताओं के विविधीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।














