कानपुर, 10 अक्टूबर।
शारदीय नवरात्र की शुरुआत के साथ ही कानपुर शहर के सभी प्रमुख देवी मंदिर दुल्हन की तरह सज चुके हैं। जगह-जगह भव्य धार्मिक मेलों की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। औद्योगिक नगरी के बीचों-बीच स्थित मां तपेश्वरी मंदिर का अपना एक विशेष पौराणिक इतिहास है, जिसका संबंध सीधे रामायण काल से जोड़ा जाता है।
मान्यता के मुताबिक त्रेतायुग में जब माता सीता को वनवास मिला था, तब वे बिठूर प्रवास के समय इस पावन स्थल पर आकर कठिन तपस्या किया करती थीं। इसी वजह से मां भगवती का नाम तपेश्वरी पड़ा। फीलखाना क्षेत्र की संकरी गलियों में स्थित इस सिद्ध पीठ पर नौ दिनों तक भक्तों का तांता लगा रहता है।
मंदिर के वरिष्ठ पुजारी राम लखन ने पौराणिक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब लक्ष्मण जी माता जानकी को ले जा रहे थे, तब इसी स्थान पर उनके रथ का पहिया रुक गया था। इसे ईश्वर का संकेत मानकर माता सीता ने यहीं अपनी साधना की। जंगलों में निवास करने और तपस्या में लीन रहने के कारण देवी को वन देवी के नाम से भी जाना जाता है।
इस पावन धाम में मां काली, कमला, विमला, सरस्वती और लक्ष्मी के स्वरूपों की पूजा की जाती है। वर्ष 1960 में इस प्राचीन मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार किया गया था। मंदिर परिसर में बने पवित्र कुंड के जल को लेकर भी अगाध निष्ठा है। ऐसी धारणा है कि कुंड का जल ग्रहण करने से शारीरिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है, हालांकि यह पूर्णतः जनआस्था पर आधारित है।
इसके अलावा, प्रभु श्रीराम और माता सीता के पुत्रों लव तथा कुश का मुंडन संस्कार भी इसी स्थान पर संपन्न हुआ था। इसी धार्मिक परंपरा का निर्वहन करने के लिए आज भी श्रद्धालु अपने बच्चों का मुंडन कराने के लिए यहां आते हैं। नवरात्र पर्व के दौरान भक्त अपनी मन्नतें पूरी कराने के लिए मंदिर में अखंड ज्योति भी प्रज्वलित कराते हैं।














