वाराणसी, 14 अक्टूबर।
शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर वाराणसी के शंकराचार्य घाट स्थित श्रीविद्या मठ में आध्यात्मिक साधना शिविर का भव्य आयोजन किया जा रहा है, जहाँ प्रतिदिन भगवती राजराजेश्वरी की महापूजा और नवचंडी पाठ के साथ 'ललितोपाख्यान' पर प्रवचन हो रहे हैं। इसी क्रम में ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उपस्थित साधकों को संबोधित करते हुए अहंकार को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया। उन्होंने कहा कि जब भी व्यक्ति के भीतर अहंकार जन्म लेता है, तो उसकी शोभा, ऐश्वर्य, कांति और सद्गुण रूपी 'श्री' का क्षय होने लगता है, इसलिए इंसान को कभी भी अपने पद, प्रतिष्ठा और अधिकारों पर घमंड नहीं करना चाहिए।
अहंकार के विनाशकारी परिणामों को स्पष्ट करते हुए शंकराचार्य ने पौराणिक प्रसंग का उल्लेख किया कि किस प्रकार दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण देवराज इंद्र श्रीहीन हो गए थे। उन्होंने बताया कि अहंकारवश इंद्र ने महर्षि द्वारा दी गई दिव्य पारिजात माला का अनादर कर उसे अपने वाहन ऐरावत के मस्तक पर रख दिया था, जिसे हाथी ने पैरों तले कुचल दिया। इस अपमान से क्रोधित होकर ऋषि दुर्वासा ने इंद्र को सर्वस्व विहीन होने का शाप दिया था, जिसके परिणामस्वरूप स्वर्गलोक से समस्त वैभव और कांति लुप्त हो गई थी। मठ के प्रवक्ता संजय पांडेय के अनुसार इस शिविर में स्फटिक मणि की राजराजेश्वरी प्रतिमा के सानिध्य में देशभर से आए साधक दीक्षा और साधना की बारीकियां सीख रहे हैं।














