नई दिल्ली, 14 अक्टूबर।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने आतंकी फंडिंग मामले में जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश नहीं किए जाने पर अलगाववादी नेता यासीन मलिक के संबंध में जेल प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है। न्यायमूर्ति नवीन चावला की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मलिक को सुनवाई के दौरान वर्चुअल माध्यम से अदालत में उपस्थित होना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए संबंधित जेल अधीक्षक को इस संबंध में जानकारी देनी होगी। मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने पहले अदालत में दावा किया था कि यासीन मलिक पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं, यहां तक कि वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के संपर्क में था और इन संबंधों का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए करता था। एनआईए के हलफनामे के अनुसार, मलिक के प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से करीबी संबंध थे और कथित तौर पर हवाला सहित अवैध माध्यमों से आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन जुटाया गया। पटियाला हाउस अदालत ने 25 मई 2022 को मलिक को आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत सजा और जुर्माने लगाए गए थे। अदालत ने सभी सजाओं को साथ-साथ चलाने का आदेश दिया था, जिससे उम्रकैद की सजा प्रभावी रही।
यासीन मलिक ने 10 मई 2022 को अदालत में अपना अपराध स्वीकार किया था। इससे पहले 16 मार्च 2022 को अदालत ने हाफिज सईद, सैयद सलाहुद्दीन, शब्बीर शाह, मसरत आलम, राशिद इंजीनियर, जहूर अहमद वताली, बिट्टा कराटे और अन्य आरोपितों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था। एनआईए के अनुसार, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में नागरिकों तथा सुरक्षा बलों पर हमलों और हिंसा को अंजाम दिया। एजेंसी का दावा है कि 1993 में अलगाववादी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना हुई और इसके कुछ नेताओं ने हवाला तथा अन्य माध्यमों से धन का लेन-देन किया। जांच एजेंसी के मुताबिक, इस धन का इस्तेमाल घाटी में अशांति फैलाने, सुरक्षा बलों पर हमले करने, स्कूलों को जलाने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए किया गया। गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के बाद एनआईए ने भारतीय दंड संहिता और यूएपीए की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।














