पटना, 14 अक्टूबर।
विभागीय जांच में गवाहों का परीक्षण नहीं होने, दस्तावेजों को प्रमाणित नहीं किए जाने और कर्मचारी को बचाव का पर्याप्त अवसर नहीं मिलने पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। पवन कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य मामले में पटना उच्च न्यायालय ने विभागीय जांच की प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को महत्वपूर्ण माना। मामले में याचिकाकर्ता सरकारी कर्मचारी था, जिसके खिलाफ दो अलग-अलग विभागीय जांच की गई थीं। आरोपपत्र में गवाहों और दस्तावेजों की सूची नहीं दी गई थी, जबकि बिहार सीसीए नियम, 2005 के नियम 17(3)(ii)(ए)(ब) के तहत इनका उल्लेख आवश्यक बताया गया। जांच अधिकारी ने न तो किसी गवाह को बुलाकर उसका परीक्षण किया और न ही दस्तावेजों को प्रमाणित कराया। इस कारण कर्मचारी को गवाहों से जिरह करने का अवसर भी नहीं मिला। इसके अलावा, विजिलेंस के टेक्निकल एग्जामिनर सेल की रिपोर्ट में संबंधित आरोपों में वित्तीय गड़बड़ी नहीं पाए जाने की बात कही गई थी, लेकिन जांच के दौरान इस रिपोर्ट पर विचार नहीं किया गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच अधिकारी को निष्पक्षता और निर्धारित नियमों के अनुरूप काम करना चाहिए। केवल आरोपों या प्रारंभिक निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामले में जांच अधिकारी ने दोनों अलग-अलग विभागीय जांचों की रिपोर्ट को जोड़कर पदावनति की बड़ी सजा दे दी थी, जबकि नियम 22 के तहत संयुक्त कार्यवाही का आदेश नहीं लिया गया था। कर्मचारी ने इन आदेशों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय ने माना कि आरोपपत्र में आवश्यक सूचियों का अभाव, साक्ष्यों का परीक्षण नहीं होना और बचाव का उचित अवसर न मिलना जांच प्रक्रिया की गंभीर खामियां हैं। अदालत के अनुसार, विभाग पर आरोपों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत साबित करने की जिम्मेदारी होती है और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने दोनों पदावनति आदेश निरस्त कर दिए। साथ ही, मामले को दोबारा विभागीय जांच के लिए भेजने से भी इनकार किया, क्योंकि प्रकरण काफी पुराना हो चुका था और इतने समय बाद फिर से जांच कराना कर्मचारी के साथ अन्यायपूर्ण होता। इस फैसले से स्पष्ट होता है कि विभागीय कार्रवाई में नियमों का पालन, प्रमाणित साक्ष्य और निष्पक्ष सुनवाई अनिवार्य हैं।













