ग्वालियर, 15 अक्टूबर।
धर्म की आड़ में पासपोर्ट बनवाने का खेल कोई नया नहीं है। ग्वालियर के डबरा स्थित सिमरिया वार्ड में छह बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारतीय पासपोर्ट दिलाने का मामला केवल जालसाजी नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। इस मामले में दलालों से ज्यादा दोषी वह व्यवस्था है, जो थोड़े से धन के लालच में अपनी जिम्मेदारी और ईमानदारी बेच देती है।
गुलाबराय गौतम उर्फ मास्टरमाइंड ने स्वीकार किया है कि वह करीब पांच साल तक सिमरिया के आंबेडकर पार्क स्थित बौद्ध विहार का प्रमुख रहा। इसी दौरान रियाल चौधरी अपने साथियों के साथ वहां आया। आरोप है कि गुलाबराय ने अपने धार्मिक और सामाजिक प्रभाव का इस्तेमाल कर पुलिस-प्रशासन को गुमराह किया। उसने और उसके चेले गयाप्रसाद ने गवाही दी कि सभी छह लोग सिमरिया टेकरी के पुराने निवासी हैं। इसके बाद आधार कार्ड, मूल निवासी प्रमाणपत्र और जन्म प्रमाणपत्र आनन-फानन में तैयार हो गए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस सत्यापन महज चार दिन में कैसे पूरा हो गया? आम आदमी को पासपोर्ट बनवाने के लिए महीनों तक थाने के चक्कर काटने पड़ते हैं। पुलिस घर आती है, पड़ोसियों से पूछताछ करती है और पुराने रिकॉर्ड खंगालती है। फिर छह विदेशी नागरिकों का सत्यापन इतनी जल्दी कैसे हो गया? यह भ्रष्टाचार की ओर गंभीर संकेत करता है।
खुद को फंसता देख गुलाबराय अब सारा ठीकरा रियाल चौधरी पर फोड़ रहा है। वह दावा कर रहा है कि उसने भरोसे में गवाही दी थी। हालांकि, एसटीएफ की जांच और बैंक खातों की पड़ताल से ही उसकी भूमिका और कथित कमाई का सच सामने आएगा। सवाल यह भी है कि सरकारी तंत्र में बैठे वे लोग कौन हैं, जिनकी मिलीभगत के बिना इतने दस्तावेज तैयार होना संभव नहीं था? आधार कार्ड, मूल निवासी प्रमाणपत्र और जन्म प्रमाणपत्र बनाने से लेकर पुलिस सत्यापन तक हर स्तर की जांच होनी चाहिए।
धर्म की आड़ सबसे आसान रास्ता बन जाती है, क्योंकि धार्मिक पहचान और प्रतिष्ठा पर सवाल उठाने से लोग हिचकते हैं। इसी भरोसे का दुरुपयोग कर यदि कोई देश की नागरिकता से जुड़ी व्यवस्था को धोखा देता है, तो वह किसी भी तरह की सहानुभूति का पात्र नहीं हो सकता।
केवल गुलाबराय को जेल भेजने से यह खेल खत्म नहीं होगा। उन अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य लोगों की भी पहचान होनी चाहिए, जिन्होंने कथित रूप से पैसे लेकर फर्जी दस्तावेज बनवाए या सत्यापन में लापरवाही की। पासपोर्ट महज एक दस्तावेज नहीं, देश की संप्रभुता से जुड़ा प्रमाण है। इसलिए दोषी विदेशी नागरिकों के साथ उन भारतीयों पर भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने चंद रुपयों के लिए देश के साथ विश्वासघात किया।













