रियाद, 15 अक्टूबर।
पश्चिम एशिया की राजनीति अक्सर तेल और सोने के महलों से समझी जाती है, लेकिन अब वही महल बंकर बनते जा रहे हैं। सऊदी अरब को दुनिया का सबसे धनी और ताकतवर अरब देश माना जाता रहा है। उसके पास अमेरिका का समर्थन, अत्याधुनिक हथियार और तेल का विशाल भंडार है। इसके बावजूद यमन के हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइलों से पैदा हुआ खतरा उसकी सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ है। शासकों के बंकरों में जाने की खबरें इसी असुरक्षा को लेकर चर्चाओं का विषय हैं।
सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा को मुख्य रूप से दो स्तंभों पर टिकाया है, तेल की ताकत और अमेरिका का संरक्षण। तेल से पैसा आया, पैसे से हथियार खरीदे गए और हथियारों से यह विश्वास पैदा हुआ कि सुरक्षा खरीदी जा सकती है। लेकिन हूतियों ने इस धारणा को चुनौती दी है। यमन दुनिया के गरीब देशों में शामिल है, फिर भी वहां के विद्रोही ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी अरब के सामरिक ठिकानों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की क्षमता रखते हैं। महंगे पैट्रियट रक्षा तंत्र के सामने सस्ते ड्रोन को रोकना आर्थिक और सामरिक चुनौती बन गया है।
यह लड़ाई महंगी तकनीक और सस्ते हथियारों की प्रभावशीलता के बीच संघर्ष बन गई है। इसके पीछे ईरान और सऊदी अरब की प्रतिद्वंद्विता भी महत्वपूर्ण है। यमन में यह संघर्ष लंबे समय तक छद्म युद्ध का रूप ले चुका है। ईरान हूतियों का समर्थन करता है, जबकि सऊदी अरब यमन की सरकार के समर्थन में रहा है। व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष के बीच हूतियों के हमलों का खतरा सऊदी अरब की चिंताएं बढ़ाता है।
बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य विश्व व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां अस्थिरता से क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ वैश्विक व्यापार भी प्रभावित हो सकता है। अमेरिका का समर्थन होने के बावजूद सऊदी अरब की सुरक्षा संबंधी चिंताएं समाप्त नहीं हुई हैं। क्षेत्रीय परिस्थितियों ने उसे अपनी विदेश नीति और नए रणनीतिक साझेदारों की भूमिका पर भी विचार करने के लिए मजबूर किया है।
प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का उद्देश्य सीमा सुरक्षा मजबूत करना और यमन में ईरानी प्रभाव को रोकना रहा है, लेकिन लंबे संघर्ष की कीमत लगातार बढ़ी है। यमन में हस्तक्षेप को शुरुआती दौर में सीमित अभियान के रूप में देखा गया था, लेकिन वर्षों बाद भी कोई निर्णायक समाधान सामने नहीं आया। तेल प्रतिष्ठानों पर हमलों का खतरा सऊदी अर्थव्यवस्था और विजन 2030 के लक्ष्यों के लिए भी चिंता का विषय है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस देश ने यमन में हवाई शक्ति का प्रदर्शन किया, वही अपनी राजधानी और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। शाही परिवार की सुरक्षा और बंकरों से जुड़ी खबरें सत्ता के मनोविज्ञान पर भी सवाल उठाती हैं। हालांकि, ऐसी खबरों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। फिर भी यह स्पष्ट है कि आधुनिक युद्ध में कोई भी महंगी सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह अभेद्य नहीं है।
हूतियों के ड्रोन और मिसाइलें केवल विस्फोटक नहीं, बल्कि एक संदेश भी हैं। युद्ध अब केवल सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि शहरों, अर्थव्यवस्थाओं और आपूर्ति शृंखलाओं के बीच भी लड़ा जा रहा है। सस्ता ड्रोन भी महंगे तेल प्रतिष्ठान को नुकसान पहुंचा सकता है। सऊदी अरब के लिए सबक यही है कि सुरक्षा केवल हथियार खरीदने से नहीं आती। इसके लिए कूटनीति, बातचीत और पड़ोसियों के साथ शांति भी जरूरी है। यमन में स्थायी शांति के बिना सऊदी अरब की सुरक्षा अधूरी रहेगी। बंकर युद्ध में कुछ समय के लिए सुरक्षा दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान बातचीत और क्षेत्रीय स्थिरता से ही निकलेगा।














