हरिद्वार, 16 अक्टूबर।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के शोधकर्ताओं ने बाढ़ के दौरान फैलने वाली जलजनित बीमारियों और उनसे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का अनुमान लगाने के लिए ‘हाइइको’ नामक मॉडल तैयार किया है। इसकी मदद से बाढ़ के पानी के फैलाव, उसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों की स्थिति और संक्रमण की आशंका का एक साथ आकलन किया जा सकेगा। इससे प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य संबंधी खतरों को समय रहते पहचानकर बचाव के कदम उठाने में मदद मिलेगी।
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2023 में दिल्ली में आई बाढ़ के आंकड़ों के आधार पर इस मॉडल का परीक्षण किया। अध्ययन में सामने आया कि बाढ़ से प्रभावित 60 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र स्वास्थ्य जोखिम की उच्च या अत्यधिक उच्च श्रेणी में थे। पानी में मौजूद हानिकारक ई-कोलाई जीवाणु की मात्रा सुरक्षित सीमा से लाखों गुना ज्यादा पाई गई। बाढ़ के पानी में खेलने वाले बच्चों में संक्रमण का खतरा भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तय सुरक्षा सीमाओं से दोगुने से अधिक पाया गया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, देश के कई शहरों में बाढ़ का पानी बिना उपचार वाले सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के साथ मिल जाता है। ऐसे दूषित पानी के संपर्क में आने से लोगों को दस्त, हैजा और दूसरी जलजनित बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। कई बार बाढ़ के दौरान पैदा होने वाले ये स्वास्थ्य जोखिम तुरंत दिखाई नहीं देते और बाद में गंभीर समस्या बन सकते हैं।
‘हाइइको’ मॉडल के जरिए उन इलाकों को चिह्नित किया जा सकेगा, जहां लोगों के संक्रमण की चपेट में आने की आशंका ज्यादा है। इसके आधार पर प्रशासन सीवेज शोधन व्यवस्था बेहतर बनाने, मानसून से पहले नालों की सफाई कराने, मोबाइल संदेशों से चेतावनी देने और पानी साफ करने की उन्नत तकनीकों का उपयोग करने जैसे कदम उठा सकता है।
यह शोध राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में उपयोगी हो सकता है। इसके अलावा, बेहतर स्वास्थ्य, स्वच्छ जल और स्वच्छता, टिकाऊ शहरों तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को भी इससे समर्थन मिल सकता है।
आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर मोहित पी. मोहंती ने कहा कि बाढ़ का नुकसान केवल इमारतों और बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रहता। इससे ऐसे गंभीर स्वास्थ्य संकट भी पैदा हो सकते हैं, जिनका शुरुआती दौर में पता नहीं चलता। उन्होंने बताया कि इस मॉडल से सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर समय पर जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस मॉडल का उपयोग भारत के अलावा दुनिया के दूसरे बाढ़ प्रभावित शहरों में भी किया जा सकता है। इसे विकसित करने वाली शोध टीम में प्रियंका त्रिपाठी, देवानंद ठाकुर, विट्ठल हरि और मोहित प्रकाश मोहंती शामिल हैं।














