वाराणसी, 17 अक्टूबर।
आध्यात्मिक साधना में सफलता और कुंडलिनी जागरण के लिए आत्मसंयम, नैतिक आचरण और अनुशासित जीवनशैली को आवश्यक बताते हुए ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने साधकों को महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। शनिवार को शारदीय नवरात्र की महासप्तमी पर शंकराचार्यघाट स्थित श्री विद्यामठ में उन्होंने कहा कि कुंडलिनी जागरण की साधना शुरू करने से पहले यम और नियम का पालन करते हुए जीवन में शुद्धता, संयम और अनुशासन विकसित करना चाहिए। आध्यात्मिक अनुभूतियों को समझने और आत्मसात करने के लिए साधक का आंतरिक आधार मजबूत होना जरूरी है। उन्होंने जल्दबाजी से बचने की सलाह देते हुए आत्मनियंत्रण और नैतिक दृढ़ता को साधना की महत्वपूर्ण नींव बताया। नवरात्र के अवसर पर मठ में नवचंडी पाठ सहित विभिन्न धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान जारी हैं।
शंकराचार्य ने कुंडलिनी जागरण के तीन प्रमुख आधार देवी कृपा, गुरु कृपा और साधक के निरंतर व्यक्तिगत प्रयास को बताया। उनके अनुसार, देवी की अहैतुकी अनुकंपा और भगवद्-अनुग्रह के साथ तत्त्वदर्शी गुरु का मार्गदर्शन, शक्तिपात और आशीर्वाद साधना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही साधक को नियमितता, निष्ठा और अनुशासन के साथ प्रयास करते रहना चाहिए। मठ में नवरात्र के दौरान प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। दिन की शुरुआत सुबह 4:30 बजे मंगलम् से होती है, इसके बाद सुबह 6 बजे साधना शिविर और 8:30 बजे महापूजा व नवचंडी पाठ होता है। दोपहर 2 बजे साधना शिविर का दूसरा सत्र आयोजित किया जाता है, जबकि शाम को विशेष अर्चन होता है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से साधकों को आध्यात्मिक अभ्यास और अनुशासित जीवन के लिए मार्गदर्शन दिया जा रहा है।














