भोपाल, 17 अक्टूबर।
महज 17 साल की उम्र में रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के कारण सचिन चमारिया के चारों अंगों में लकवा हो गया, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय अपनी जिंदगी को नई दिशा देने का संकल्प लिया। वर्ष 2021 में बोकिया खेल से जुड़ने के बाद उन्होंने लगातार मेहनत और अभ्यास के दम पर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। सचिन लगातार छह बार राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। वर्ष 2024 में बहरीन में आयोजित विश्व बोकिया चैलेंजर प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल करने वाले भारत के पहले पुरुष बीसी-3 खिलाड़ी बने। वर्ष 2026 में काहिरा में हुई विश्व बोकिया चैलेंजर प्रतियोगिता में उन्होंने सरिता द्विवेदी के साथ बीसी-3 युगल स्पर्धा में रजत और व्यक्तिगत स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल किया। विश्व रैंकिंग में 19वें स्थान पर मौजूद सचिन अब 18 अक्टूबर से शुरू होने वाले आइची-नागोया पैरा एशियाई खेल-2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। वह व्यक्तिगत और युगल, दोनों स्पर्धाओं में पदक जीतने के लक्ष्य के साथ उतरेंगे।
सचिन का मानना है कि भारत में बोकिया को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता, सुलभ प्रशिक्षण केंद्रों, विशेषज्ञ प्रशिक्षकों, उपयुक्त उपकरणों और प्रशिक्षित स्पोर्ट असिस्टेंट की उपलब्धता बढ़ाना जरूरी है। बीसी-3 वर्ग के खिलाड़ियों को रैंप और विशेष उपकरणों की जरूरत होती है, जिनके लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार, खेल महासंघों, निजी कंपनियों और प्रायोजकों को दिव्यांग खिलाड़ियों को नियमित सहयोग देना चाहिए, ताकि वे प्रशिक्षण, यात्रा और प्रतियोगिताओं के खर्च की चिंता किए बिना अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित कर सकें। सचिन के अनुसार, दिव्यांगता किसी व्यक्ति की पूरी पहचान नहीं है और खिलाड़ियों का मूल्यांकन उनकी मेहनत, प्रतिभा तथा उपलब्धियों के आधार पर होना चाहिए। वह चाहते हैं कि भारत में बोकिया को व्यापक पहचान मिले, घरेलू प्रतियोगिताओं और प्रशिक्षण शिविरों का विस्तार हो तथा अधिक दिव्यांग युवाओं को खेल में करियर बनाने का अवसर मिले। उनका लक्ष्य एशियाई पैरा खेलों में बेहतर प्रदर्शन के साथ भारतीय बोकिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाना है।











