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संपादकीय
17 Oct, 2026

उम्र के आखिरी पड़ाव में अकेलापन क्यों बढ़ रहा है

बदलते परिवारों और रोजगार के लिए पलायन के बीच बुजुर्गों की देखभाल, संपत्ति की सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए व्यापक सामाजिक तथा कानूनी व्यवस्था की जरूरत बढ़ रही है।

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर।

बदलते समय की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि घर छोटे होते जा रहे हैं और दूरियां बढ़ती जा रही हैं। पहले एक ही आंगन में तीन पीढ़ियां रहती थीं। आज एक ही शहर में माता-पिता और बच्चे अलग-अलग फ्लैटों में रहते हैं और कई बार बच्चे देश के दूसरे कोने में या विदेश चले जाते हैं। पढ़ाई और नौकरी ने परिवार की पुरानी संरचना को पूरी तरह बदल दिया है। इसी बदलाव ने एक नई सामाजिक चुनौती को जन्म दिया है, वह है बुजुर्ग माता-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी की देखभाल।

हाल ही में केरलम में बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए एक व्यापक विधेयक लाने की पहल हुई है। इसके पीछे उद्देश्य बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, उनकी संपत्ति पर अवैध कब्जे और देखभाल के नाम पर हो रहे शोषण को रोकना है। यह सोच केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रह सकती, क्योंकि समस्या पूरे देश में एक जैसी है।

केरलम में साक्षरता अधिक है और पलायन भी अधिक है, इसलिए वहां यह समस्या पहले दिखाई दी। लेकिन पंजाब के गांवों में भी यही दृश्य है, जहां बच्चे विदेश चले गए हैं और पीछे बुजुर्ग अकेले रह गए हैं। कर्नाटक और महाराष्ट्र के सूचना प्रौद्योगिकी वाले शहरों में काम करने वाले युवाओं के माता-पिता उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और ओडिशा के छोटे कस्बों में अकेले जीवन जी रहे हैं। यह अब राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है।

यह समझना जरूरी है कि बच्चों का पढ़कर बाहर नौकरी करने जाना कोई अपराध नहीं है। यह प्रगति है और हर माता-पिता चाहता है कि उसका बच्चा आगे बढ़े। लेकिन सवाल यह है कि जब बच्चे आगे बढ़ जाते हैं, तो पीछे रह गए बुजुर्गों का क्या होता है? अस्सी साल की उम्र में दवा लाने वाला कोई चाहिए होता है। रात में तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल ले जाने वाला और दिनभर बात करने वाला कोई चाहिए होता है। वीडियो कॉल इस कमी को पूरा नहीं कर सकता। इससे भावनात्मक दूरी कुछ कम हो सकती है, लेकिन शारीरिक देखभाल की कमी पूरी नहीं होती।

यही कारण है कि आज वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है और कई जगह देखभाल के नाम पर चल रहे केंद्रों में भी लापरवाही तथा शोषण की खबरें आती हैं।

एक और बड़ा पहलू संपत्ति का है। कई मामलों में देखा गया है कि बुजुर्गों की संपत्ति पर उनके दूर के रिश्तेदार या आसपास के लोग नजर रखते हैं और उनकी कमजोरी का फायदा उठाकर कब्जा करने की कोशिश करते हैं। कई बार बुजुर्गों को डराकर या बहलाकर उनकी जमीन या मकान अपने नाम लिखवा लिया जाता है। जब तक बुजुर्ग अपने पैरों पर खड़े होते हैं, तब तक वे विरोध कर पाते हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ वे थक जाते हैं। तब उन्हें मजबूत कानूनी सहारे की जरूरत पड़ती है। केवल नैतिक शिक्षा से यह काम नहीं चलेगा, कानून का डर जरूरी है।

हमारे समाज में हमेशा कहा गया है कि माता-पिता की सेवा करना संतान का धर्म है। यह बात सही है, लेकिन धर्म केवल कहने से नहीं निभता। आज के भागदौड़ भरे जीवन में, जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी कर रहे हैं और बच्चों की अपनी व्यस्तताएं हैं, वहां केवल नैतिकता के भरोसे बुजुर्गों को नहीं छोड़ा जा सकता। कानून इसलिए जरूरी है, ताकि जानबूझकर अपने बुजुर्गों की उपेक्षा करने या उनकी संपत्ति हड़पने वालों को सजा मिले और देखभाल केंद्र जवाबदेह बनें।

एक अच्छे कानून में बुजुर्गों के साथ मारपीट, मानसिक प्रताड़ना और आर्थिक शोषण को गंभीर अपराध माना जाना चाहिए। हर जिले में उनकी शिकायतें सुनने के लिए अलग इकाई हो, जो तुरंत कार्रवाई करे। सभी वृद्धाश्रमों, दिवसीय देखभाल केंद्रों और घरेलू देखभाल सेवाएं देने वाली संस्थाओं का पंजीकरण अनिवार्य हो और उनकी नियमित जांच की जाए। बिस्तर पर पड़े बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए विशेष आंकड़ा संग्रह और स्वयंसेवकों का नेटवर्क बनाया जाए।

दुनिया अब बुजुर्गों को बोझ नहीं, बल्कि अनुभव का स्रोत मान रही है। इसे सिल्वर इकोनॉमी कहा जाता है, यानी पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की जरूरतों और अनुभवों पर आधारित अर्थव्यवस्था। बुजुर्गों के पास अनुभव है, समय है और कई बार आर्थिक क्षमता भी है। यदि उन्हें सही अवसर दिया जाए, तो वे समाज को बहुत कुछ दे सकते हैं। वे बच्चों को संस्कार दे सकते हैं और अपने अनुभव से युवाओं का मार्गदर्शन कर सकते हैं। लेकिन यह तभी संभव है, जब उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिले।

आज अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियम हैं। कहीं देखभाल के लिए कानून है, तो कहीं नहीं। इससे पूरे देश में एक समान सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। इसलिए अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार इस विषय पर राष्ट्रीय कानून बनाए, जो पूरे देश में लागू हो और जिसमें केरलम जैसे राज्यों के अच्छे अनुभवों को शामिल किया जाए।

समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। बुजुर्गों की देखभाल केवल सरकार या कानून की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है। मोहल्ले के लोग, आवासीय कल्याण समितियां और स्थानीय निकाय, सभी को इसमें भूमिका निभानी होगी।

कोई समाज कितना सभ्य है, इसका पैमाना इस बात से तय होता है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। हम चांद पर जा रहे हैं, नई तकनीक बना रहे हैं, लेकिन यदि हमारे ही घर में बुजुर्ग अकेले और असुरक्षित हैं, तो यह प्रगति अधूरी है।

बच्चों का बाहर जाना नहीं रुकेगा और रुकना भी नहीं चाहिए, लेकिन पीछे रह गए माता-पिता की देखभाल के लिए मजबूत व्यवस्था बनाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। यह व्यवस्था कानून के माध्यम से मजबूत होनी चाहिए और पूरे देश में समान सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। तभी हम कह सकेंगे कि हम एक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज हैं।

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