भोपाल, 17 अक्टूबर।
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी संजीव कुमार झा की अध्यक्षता में हुई मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की बैठक में सबसे महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण फार्म छह को लेकर दिया गया। बताया गया कि फार्म छह जमा करने के बाद अलग से घोषणा-पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। यह स्पष्टीकरण इसलिए जरूरी हो गया था, क्योंकि जमीनी स्तर पर बूथ लेवल अधिकारियों से लेकर मतदाताओं तक में यह भ्रम फैल गया था कि फार्म छह के साथ अलग से एक शपथ-पत्र भी देना होगा।
आयोग ने स्पष्ट किया कि फार्म छह स्वयं में ही एक घोषित प्रारूप है। उसमें आवेदक अपनी आयु, नागरिकता और निवास की घोषणा करता है तथा निर्धारित दस्तावेज संलग्न करता है। इसलिए अलग से घोषणा-पत्र मांगना दोहराव और अनावश्यक बोझ है। इस स्पष्टीकरण का सीधा संबंध अभियान की सफलता से है, क्योंकि प्रदेश के सभी जिलों में छूटे हुए और पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चल रहा है।
इस विषय का दूसरा पक्ष अधिक गंभीर है। यदि घोषणा-पत्र की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई, तो क्या अपात्र लोग इस छूट का फायदा उठा लेंगे? यह आशंका राजनीतिक दलों ने भी बैठक में उठाई। घोषणा-पत्र एक स्वघोषित दस्तावेज था, जिसमें व्यक्ति स्वयं लिखकर देता था कि वह भारत का नागरिक है और उसकी आयु अठारह वर्ष पूरी हो चुकी है। इस स्वघोषणा की कानूनी वैधता तो थी, लेकिन व्यावहारिक सत्यापन की क्षमता बहुत कम थी, क्योंकि कोई भी व्यक्ति कुछ भी लिखकर दे सकता था।
अब व्यवस्था यह है कि स्वघोषणा के स्थान पर दस्तावेज आधारित सत्यापन को मजबूत किया गया है। फार्म छह के साथ आयु, निवास और पहचान के प्रमाण निर्धारित नियमों के अनुसार देना अनिवार्य है। इसका अर्थ है कि छूट नहीं दी गई, बल्कि प्रक्रिया में बदलाव किया गया है। पहले कागज पर लिखी बात को सच माना जाता था, अब दस्तावेजों के माध्यम से उसका सत्यापन किया जाएगा। यह व्यवस्था अधिक पारदर्शी हो सकती है।
सत्यापन तंत्र का मूल प्रश्न यह नहीं है कि घोषणा-पत्र लिया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि सत्यापन कौन करेगा और कैसे करेगा। यदि कोई व्यक्ति गलत दस्तावेज लगाकर मतदाता बनना चाहे, तो उसे रोकने के लिए घोषणा-पत्र नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर भौतिक सत्यापन अधिक कारगर होगा। तहसील स्तर पर एसडीएम, तहसीलदार और जिला स्तर पर जिला निर्वाचन अधिकारी को इसी कार्य में लगाया गया है, ताकि वे प्रत्येक आवेदन का जमीनी सत्यापन कराएं।
साथ ही, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में विसंगतियों को दूर करने का कार्य भी चल रहा है। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित सभी दलों ने इस बात पर जोर दिया है कि नाम जोड़ने की प्रक्रिया सरल हो, लेकिन मतदाता सूची की शुद्धता बनी रहे।
पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के पास अक्सर घोषणा-पत्र बनवाने के लिए न तो समय होता है और न ही पर्याप्त जानकारी। वे नोटरी या शपथ-पत्र के नाम से ही झिझक जाते हैं और अपना नाम दर्ज कराने से पीछे हट जाते हैं। इस मनोवैज्ञानिक बाधा को हटाना ही इस स्पष्टीकरण का सबसे बड़ा लाभ है। जब फार्म छह ही पर्याप्त होगा, तो युवा स्वयं ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन कर सकेंगे और लोकतंत्र में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।
इसलिए इस विषय को इस रूप में देखना चाहिए कि आयोग ने कोई सुरक्षा दीवार नहीं हटाई है, बल्कि दो दीवारों को मिलाकर एक मजबूत दीवार बनाने की कोशिश की है। फार्म छह अब स्वयं आवेदन भी है और घोषणा भी।
छूट का गलत फायदा रोकने के लिए अतिरिक्त कागज की नहीं, बल्कि सख्त दस्तावेजी जांच, घर-घर सत्यापन और राजनीतिक दलों की सक्रिय निगरानी की आवश्यकता है। यदि बूथ लेवल अधिकारी ईमानदारी से जांच करें और राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट आपत्तियां दर्ज कराने में सक्रिय रहें, तो अपात्र व्यक्तियों को मतदाता सूची में शामिल होने से रोका जा सकता है। यही इस पूरे निर्णय का सार है, प्रक्रिया सरल हो, लेकिन निगरानी कठोर हो।














