भोपाल, 17 अक्टूबर।
मध्यप्रदेश के गांवों में एक अजीब संकट खड़ा हो गया है। केंद्र से ग्राम पंचायतों को विकास के लिए मिलने वाला पैसा अब अटक सकता है। केंद्रीय वित्त आयोग ने स्पष्ट किया है कि ग्राम पंचायतों को अपने संसाधनों से राजस्व बढ़ाना होगा। पंचायतें टैक्स लगाने और वसूलने में नाकाम रही हैं। कानून में उन्हें अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन राजनीतिक डर के कारण सरपंच टैक्स वसूलने से बचते हैं। उन्हें लगता है कि लोगों से पैसा लिया तो अगला चुनाव हार सकते हैं। इसी उपेक्षा का नतीजा है कि पंचायतें पूरी तरह सरकारी अनुदान पर निर्भर हैं।
केंद्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार, ग्राम पंचायतों को अपने संसाधनों से राजस्व बढ़ाना होगा। प्रति परिवार कम से कम 1200 रुपये सालाना वसूलने और इस वसूली को 10 से 25 गुना तक बढ़ाने की बात कही गई है। यह व्यवस्था 2028-29 से लागू होगी। आयोग का तर्क है कि गांव की सरकार अपने लोगों से राजस्व नहीं जुटाएगी तो आत्मनिर्भर कैसे बनेगी? लेकिन सवाल यह है कि पंचायतों के पास आय के साधन ही कहां हैं? पंचायत भवन के अलावा उनके पास अपनी जमीन नहीं है। अधिकांश जमीन राजस्व या नजूल विभाग के अधीन है। पंचायतें उस पर दुकानें या बाजार विकसित नहीं कर सकतीं।
राज्य वित्त आयोग ने जिलों के दौरे में पाया कि पंचायतों के पास आय के साधनों का अभाव है। इसलिए पंचायतों को व्यावसायिक जमीन देने की सिफारिश की जा रही है, ताकि वे दुकानें बनाकर किराये पर दे सकें या छोटे बाजार विकसित कर सकें। लेकिन जब तक इस पर ठोस फैसला नहीं होता, तब तक पंचायतों की आय बढ़ाने की योजना अधूरी रहेगी।
गांवों में सरपंच का चुनाव सामाजिक रिश्तों और आपसी समीकरणों पर निर्भर करता है। हर मतदाता पड़ोसी या रिश्तेदार होता है। ऐसे में घर या पानी का टैक्स मांगने पर नाराजगी का डर बना रहता है। राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया ने भी जिलों के दौरों में इस समस्या को महसूस किया। इसी कारण पंचायतों में नियमित कर वसूली की व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई।
इस समस्या के समाधान के लिए अलग नियामक आयोग बनाने का सुझाव दिया जा रहा है, जो कर की दरें तय करे और वसूली की व्यवस्था सुनिश्चित करे। इससे सरपंचों पर राजनीतिक दबाव कम हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल आयोग बनाने से वसूली सुनिश्चित हो जाएगी? इस व्यवस्था के नियम दो साल बाद भी नहीं बन पाए हैं। वरिष्ठ सचिव समिति ने भी इस देरी पर सवाल उठाए हैं।
पंचायतों को सड़क, बिजली, पानी और सीवेज जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी हैं, लेकिन आय के साधन ही नहीं होंगे तो विकास कैसे होगा? यदि हर परिवार से 1200 रुपये सालाना वसूले जाते हैं, तो ग्रामीणों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। इसलिए जरूरी है कि वसूली की राशि का पारदर्शी हिसाब रखा जाए और जनता को बताया जाए कि पैसा कहां खर्च हुआ।
राज्य सरकार को पहले पंचायतों को जमीन और व्यावसायिक अधिकार देने चाहिए, फिर कर वसूली की प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए। जब तक गांव की सरकार के पास जमीन, आय के साधन और जनता का भरोसा नहीं होगा, तब तक आत्मनिर्भर पंचायत का सपना अधूरा रहेगा।













