नासिक, 17 अक्टूबर।
देश की थाली में आज प्याज के दाम आंसू ला रहे हैं। बाजार में भाव 60 रुपये किलो तक पहुंच गया है। गरीब आदमी सब्जी में प्याज डालने से पहले दस बार सोच रहा है और ठीक उसी समय नासिक के सरकारी गोदामों में दस लाख क्विंटल प्याज सड़कर काला पड़ गया है। यह कैसा मजाक है, एक तरफ किल्लत और दूसरी तरफ बर्बादी! सरकार ने कुछ महीने पहले 23 रुपये किलो के हिसाब से लासलगांव मंडी से प्याज खरीदा था। इरादा था कि जनता को राहत मिलेगी, लेकिन नाफेड और एनसीसीएफ जैसी संस्थाओं ने जो प्याज खरीदा, वह गोदामों में ही दम तोड़ गया। दो लाख क्विंटल से कुछ ज्यादा प्याज ही बाजार तक पहुंच पाया, बाकी नौ लाख क्विंटल से अधिक अब कचरा बन चुका है।
नासिक के चांदवड़ में जो दृश्य है, वह लापरवाही की पराकाष्ठा दिखाता है। गोदाम की निचली परत में पानी भर गया और पूरा प्याज उसमें डूबकर सड़ गया। अब वहां ऐसी दुर्गंध उठ रही है कि पास खड़ा होना भी मुश्किल है। अधिकारियों ने 30 सितंबर, 5 अक्टूबर और 10 अक्टूबर को तीन बार नीलामी की कोशिश की। एक रुपये किलो का भाव लगाया, लेकिन कोई खरीदने वाला नहीं आया। अब अधिकारी कह रहे हैं कि इसे खाद बनाने के लिए दो से चार रुपये किलो में बेचा जाए। यानी जनता के पैसे से खरीदा गया 23 रुपये वाला प्याज अब खाद के भाव भी नहीं बिक रहा।
खराब माल खरीदने का मामला पहले ही सामने आ चुका था। सरकारी सतर्कता समिति ने अपनी रिपोर्ट में खराब गुणवत्ता का प्याज खरीदे जाने की बात कही थी, जो पहले से ही सड़ने की कगार पर था। सवाल यह है कि जब समिति ने चेतावनी दे दी थी, तो फिर इतना बड़ा स्टॉक क्यों खरीदा गया? खरीद से पहले गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं हुई? क्या किसी ने आंखें बंद करके माल खरीद लिया या इसके पीछे कमीशन का खेल था?
सरकार ने फिर जांच बैठा दी है। नासिक के जिलाधिकारी को सभी खरीद केंद्रों और गोदामों का निरीक्षण कर 26 अक्टूबर तक रिपोर्ट देने को कहा गया है। लेकिन जनता पूछ रही है कि जांच का ढिंढोरा आखिर कब तक पीटा जाएगा? प्याज सड़ने पर जांच, दाल सड़ने पर जांच और अनाज भीगने पर जांच, लेकिन सजा किसी को नहीं मिलती। जब सतर्कता समिति पहले ही खराब माल की जानकारी दे चुकी थी, तो अब नई जांच किस बात की? सीधे कार्रवाई क्यों नहीं होती?
इस पूरे मामले में जिम्मेदार कौन है? क्या केवल गोदाम का चौकीदार या छोटा कर्मचारी जिम्मेदार है, या वे बड़े अधिकारी भी जवाबदेह हैं जिन्होंने भंडारण क्षमता की पर्याप्त व्यवस्था किए बिना इतनी बड़ी मात्रा में प्याज खरीदा? गोदामों में पानी निकासी, नमी नियंत्रण और हवा की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? यह केवल लापरवाही नहीं, सरकारी संसाधनों के प्रति गंभीर गैरजिम्मेदारी है।
इस बर्बादी की कीमत किसान, उपभोक्ता और देश की अर्थव्यवस्था चुका रहे हैं। किसान ने खेत में पसीना बहाया, उपभोक्ता 60 रुपये किलो प्याज खरीद रहा है और सरकारी खजाने से खरीदा गया माल कचरा बन गया। यदि प्याज समय पर बाजार में पहुंचता, तो कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती थी।
अब जांच के नाम पर लीपापोती बंद होनी चाहिए। जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए और सरकारी नुकसान की भरपाई के लिए नियमानुसार कदम उठाए जाएं। गोदामों की व्यवस्था वैज्ञानिक बनाई जाए और भंडारण की स्थिति की नियमित निगरानी हो। जब तक लापरवाही पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक प्याज ही नहीं, देश के दूसरे संसाधन भी इसी तरह सड़ते रहेंगे और हम जांच के ढिंढोरे पीटते रहेंगे।














