भोपाल, 17 अक्टूबर।
कहा जा रहा है कि अब बेसमेंट में कारोबार नहीं होगा, बड़ी इमारतों में चौबीस घंटे प्रशिक्षित लोग तैनात रहेंगे और नियम तोड़ने पर सीधे जेल जाना पड़ेगा। पढ़ने में लगता है कि अब सब ठीक हो जाएगा, लेकिन भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में रहने वाले लोग जानते हैं कि यह कहानी नई नहीं है। हर बड़ी आग के बाद नई गाइडलाइन आती है और कुछ महीनों में सब ठंडा पड़ जाता है। नियम पहले भी थे, लेकिन उन्हें मानता कोई नहीं था।
सबसे कड़वा सच यह है कि आज नए नियमों के नाम पर बताई जा रही कई बातें पहले से ही कानून की किताबों में मौजूद थीं। बेसमेंट का उपयोग पार्किंग के लिए होना चाहिए। वहां दुकान, किचन या क्लासरूम नहीं बनाया जा सकता। अग्निशमन उपकरण लगाना, रास्ते खुले रखना और बिजली के तारों को सुरक्षित रखना पहले भी अनिवार्य था। इसके बावजूद कोचिंग सेंटर बेसमेंट में चलते रहे, हॉस्टल के बच्चे वहां सोते रहे और रेस्टोरेंट के किचन वहीं चलते रहे। कारण नियमों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने और करवाने वालों की लापरवाही है।
एक आम आदमी सोचता है कि यह सब छिपकर होता होगा, लेकिन सच्चाई यह है कि कई जगहों पर यह खुलेआम होता है। नगर निगम का अमला हर गली और वार्ड में घूमता है। उसे पता होना चाहिए कि कहां बेसमेंट में क्या चल रहा है। फिर कार्रवाई क्यों नहीं होती? टाउन प्लानिंग विभाग नक्शा पास करता है, फायर विभाग एनओसी देता है, विद्युत विभाग कनेक्शन देता है और नगर निगम लाइसेंस जारी करता है। हर विभाग दूसरे पर जिम्मेदारी डाल देता है और इसी बीच नियमों का उल्लंघन जारी रहता है।
जमीनी हकीकत यह है कि कई जगह अग्नि सुरक्षा की व्यवस्था नोटिस और औपचारिकताओं तक सीमित रह जाती है। घटना होने पर नोटिस जारी होता है, अखबारों में तस्वीरें छपती हैं और कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। यदि नियम तोड़ने वालों के खिलाफ समय पर कार्रवाई होती, तो शायद कई हादसे रोके जा सकते थे। निजी एजेंसियों के सुरक्षा ऑडिट और अधिकारियों की जांच प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि कागजों पर सुरक्षित घोषित इमारतें वास्तव में सुरक्षित हों।
बेसमेंट में कारोबार इसलिए भी बढ़ता है, क्योंकि वहां जगह कम किराये पर मिल जाती है। कोचिंग संचालक को बड़ी जगह मिलती है, रेस्टोरेंट संचालक किचन बना लेता है और हॉस्टल संचालक अधिक कमरे तैयार कर लेता है। लेकिन इस लालच की कीमत छात्र, मरीज और आम ग्राहक चुकाते हैं। बेसमेंट में आग लगने पर धुआं तेजी से भर सकता है और बाहर निकलने के रास्ते बंद होने पर जान बचाना मुश्किल हो जाता है।
इलेक्ट्रिक वाहन पार्किंग में हीट सेंसर और ऊंची इमारतों में अग्निशमन कर्मियों की तैनाती जैसे प्रावधान उपयोगी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्याप्त प्रशिक्षित अमला उपलब्ध है? कहीं ऐसा न हो कि सुरक्षा के नाम पर केवल एक गार्ड को वर्दी पहनाकर खड़ा कर दिया जाए।
बिना एनओसी इमारत चलाने या सील तोड़ने पर एफआईआर और जेल का प्रावधान तभी प्रभावी होगा, जब कार्रवाई निष्पक्ष हो। हादसे में मौत होने पर बिल्डर के साथ संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। हर इमारत की अग्नि सुरक्षा जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक हो और नागरिक ऑनलाइन उसकी एनओसी की वैधता देख सकें। नोटिस और वसूली की संस्कृति खत्म कर जवाबदेही तय करनी होगी।
आग ईंट और सीमेंट से नहीं, लालच, लापरवाही और भ्रष्टाचार से लगती है। जब तक सरकार और नगर निगम नियमों को ईमानदारी से लागू नहीं करेंगे, तब तक कोई नया नियम लोगों की जान की गारंटी नहीं बन सकता।














